कल एक मित्र ने इन फोटो को भेजा और कहा कि कल बारात आई थी आज बेटी विदा हो गई उस घर से जिसके पास घर के नाम पर पॉलिथीन की झोपड़ी होती है।
बांदा:- बुन्देलखण्ड के गांवों और छोटे-छोटे कस्बों की सड़कों किनारे पर एक त्यक्त समाज रहती है जिनको हम लोग लोहपीटा (पछैया लोहार)कहतें हैं
अपना दल एस बबेरू के विधानसभा अध्यक्ष अरुण कुमार पटेल (कोर्रा खुर्द) बताते है कि यह लोग महाराणा प्रताप की उस परम्परा का निर्वहन कर रहें हैं जिसमें महाराणा प्रताप ने कभी घास की रोटी खाई होंगीं।
है न कमाल कि घरों, बंगलों और व्यंजन,स्वाद से भरी इस दुनिया में इनकी पीढियां सड़क से उठने वाली धूल को भोजन के साथ लेने को अभिशप्त हैं और पॉलिथीन के घर में रहने को मजबूर। यह लोग न चोरी करतें हैं न बेईमानी जानते हैं और स्वार्थ इनके चरित्र से मीलों दूर हैं।
इनकी न जाने कितनी पीढियां सड़कों के किनारे रहते-रहते होम हो गईं लेकिन इनके आस-पास रहने वाले सभ्य सुसंस्कृत समाज को कोई फर्क नहीं पडा।
हमारी सभ्य और सुसंस्कृत होने की पहचान भी यही है कि हम कहते रहें कि हमें फर्क नहीं पड़ता दरअसल हम इतने झूठे,स्वार्थी और दुष्ट हो चुके हैं कि हम स्वयं को इतनी परतों से ढके रखकर ही अपनी धूर्तता को छुपा सकते हैं।
खुशी है तो यह कि यह उस शिक्षा से कोसों दूर हैं जिसने हमें धूर्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इनसे कई बार बात की लेकिन सार्थक उत्तर नहीं मिले।
बस एक बार इनके कबीले के एक बुजुर्ग ने जरूर कहा था कि बिटुआ शिक्षा यही सब देती है जो हम देख रहे हैं तो हम लोग अशिक्षित भले।
यह तमाचा था हमारी सभ्य और सुसंस्कृत समाज पर हालांकि हमें ऐसे तमाचों से कोई फर्क नहीं पड़ता सो हम घरों और बंगलों में रहेंगे और यह लोग धूल खाते हुए हमारी सड़कों के किनारे पॉलिथीन में।