प्रशासन ने तीन पत्रकारों सहित दो समाजसेवियों को किया नजर कैद
बांदा प्रशासन द्वारा चौथे स्तंभ को कहीं रौंदने की तैयारी तो नही क्या संविधान में वर्णित लोकतंत्र की हत्या का है प्रयास



दीक्षित को पहले तो 15 तारीख को शाम 7:00 बजे घर जाने से पहले पुलिस के लाव लश्कर सहित लगभग 40 लोगों के साथ गिरफ्तार कर लिया जाता है इसके बाद गिरवा थाना तथा नगर कोतवाली लाया जाता है कोतवाली में पहले से ही मौजूद पत्रकार जिनकी संख्या लगभग तीन दर्जन हो गई थी वहा पहुंच गए थे जब पत्रकारों की भीड़ लगातार बढ़ रही थी तो पुलिस प्रशासन को मौके की नजाकत देखते हुए केके दीक्षित को छोड़ना पड़ा वही तुरंत ही मुकदमा भी पंजीकृत कर लिया गया इसके बाद 17 तारीख को रात 12:00 बजे से पुलिस का पहरा लगा दिया गया और जब तक मुख्यमंत्री का उड़न खटोला बांदा की धरती से उड़कर लखनऊ नहीं पहुंच गया तब तक घर में ही नजर कैद कर लिया गया आखिर क्या कारण रहा क्या जिला प्रशासन बांदा में हुई मूलभूत घटनाओं से मुख्यमंत्री को दूर रखना चाहता था क्योंकि अगर वह घटनाएं बांदा में हुई हैं अगर उनका सच मुख्यमंत्री तक पहुंचता निश्चित तौर से बांदा में एक बार बहुत बड़ा फेरबदल प्रशासनिक अमले का हो सकता था यह बात कहीं ना कहीं जिले के आला अफसरों के संज्ञान में थी तभी जो पत्रकार मुख्यमंत्री के सामने आवाज बुलंद कर सकते थे उनको पहले से ही घर में नजर कैद कर दिया गया तथा जो समाजसेवी बात को रख सकते थे उन्हें भी नजर कैद कर लिया गया मनसा कुछ भी रही हो परंतु यह निश्चित है चौथे स्तंभ को दबाने का डराने का जो प्रयास किया गया है निश्चित तौर से उस की घोर निंदा की जानी चाहिए