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संपादकीय

सत्य सनातनधर्म की जय।सत्यमेव जयते।योग: कर्मषु कौशलम्

सत्य सनातनधर्म की जय।सत्यमेव जयते।योग: कर्मषु कौशलम्।

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हमसब मिलकर संकल्प लें ।

आलेखक: प्रभाकर चौबे चिंतन विचारक मंच ।

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बसुधैव कुटुम्बकम और जीव मात्र के कल्याण तथा धर्माधारित व्यवस्था जिसका सार है परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम् अर्थात परोपकार पुण्य और परपीडन पाप है को लागू करके जीव मात्र का कल्याण ही हमारा संकल्प हो।।

षोडस संस्कारयुक्त , यज्ञकर्माधारित , धर्मानुशासित, संस्कारित व्यवस्था ही सनातनधर्म व्यवस्था है ।यज्ञ वह है जिससे तृण से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त की तृप्ति हो।इस यज्ञमय जीवन पद्धति के मूल मे गौ ,वेद, ब्राह्मण और यज्ञकर्म हैं । चूंकि ब्राह्मणो ने तप से वेद और ज्ञानादि अर्जित किये तथा विश्व को उससे अवगत कराकर सबको एक चिन्तामुक्त, सुरक्षित ,प्रकृति के पोषण एवं उसके अवदानो से मानवजीवन को सुखी, धार्मिक स्वस्थ बनाने की योजना पर काम किया ।राजनीति , अर्थशास्त्र, आयुर्वेद , पशुपालन, कृषि ,वस्त्र निर्माण ,खाना बनाना, बढईगिरी सुनारी ,लोहारी सब सिखाया ।सभी लोगो को एक परिवार की तरह एकजुट करके श्रमविभाजन के जरिये व्यक्ति और परिवार पर अनावश्यक बोझ खत्म करके एक मानव को दिव्य मानव बनाने का संकल्प लिया । ज्ञान ,विज्ञान, पराभौतिक विज्ञान, पर आधारित सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ( ब्राह्मण) के( ब्राह्मणवादी ) सृष्टि तत्व पर आधारित एक वृहत सामाजिक ,पारिवारिक ,धार्मिक अनुशासित, धर्मनिष्ठ व्यवस्था को कायम करने के प्रयासो के लिए लोकशिक्षण का कार्य करना ही ब्राह्मणो ने अपनाया जिस जीवनशैली और व्यवस्था को हम शुद्ध सनातन धर्म व्यवस्था कहते हैं ।जिससे फलस्वरूप रामराज्य कायम हुआ ।भरत जैसा भाई , हनुमान जी जैसा सेवक और राम जानकी जैसे पुत्र पुत्रवधु जैसे व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव हुआ । इसी ज्ञान के विस्तार को ब्राह्मणवाद कहकर कुछ सिरफिरे मन्दबुद्धि अभागे (जगत और माया को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानकर जीवन को नरक बनाने वाले लोग इस महान उदात्त विचारधारा को) घेरने का प्रयास करते रहे हैं ।हम संकल्प लेते है कि अपने महान ऋषि मुनियो के महान तप से अर्जित ज्ञानाधारित सुखमय त्याग तपमय जीवन शैली से फिर से भारत को समुन्नत करेंगे।जीवन के वास्तविक लक्ष्य को हासिल करने के लिए धार्मिक राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था को धर्ममय करेंगे। सनातनधर्म संस्कृति से कटकर जीवन का परम लक्ष्य हासिल करना संभव ही नही है।

समाज के सभी भाईयो को सत्यधर्म, ईमानदारी, कर्मठता पूर्ण जीवनशैली को धारण करने के लिए विवश करने के साथ ,त्वरित और नि: शुल्क न्याय , नि: शुल्क शिक्षा एवं नि: शुल्क चिकित्सा तथा भोजन ,वस्त्र , आवास एवं रोजगार की गारंटी। प्रेम , सदभावना, सहिष्णुता , भाईचारे के विकास हेतु एक सांस्कृतिक सामाजिक क्रान्ति की नीव डालना जो एक विशाल बटवृक्ष का रूप ले ले और दैवी गुणो मूल्यो से मानव जीवन धन्य धन्य हो उठे। हम इन्ही संकल्पो के साथ आपके बीच आये हैं ।सनातन धर्म संस्कृति और इस विचारधारा की पुष्टि संरक्षण हेतु राम , परशुराम और श्रीकृष्ण जैसे अवतार तथा आदि गुरू शंकराचार्य जैसे दिव्य आत्माये भारत भूमि मे आती रही हैं । हम अपने उन अवतार

सत्ताओ द्वारा संरक्षित ,पोषित व्यवस्था की रक्षा का संकल्प लें।

पंडित प्रभाकर चौबे ।

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