विवेकानन्द अंग्रेजी बोलना जानते थे । भारत की सनातनी संस्कृति का ज्ञान होने पर वे इसको विश्वभर मे प्रचारित कर सकते हैं ,परमहंस रामकृष्ण जी ने इसको भांप लिया था ।इसलिए उनको अपना शिष्य बनाकर अपनी सिद्धियो से प्राप्त ज्ञान से युक्त किया ।
विवेकानन्द जी अपने गुरू की भांति समझ गये थे कि मानवता से बडा धर्म नहीं । परोपकार करना लोगो की भलाई करना ही धर्म का सार है ,सबसे बडी पूजा है। आजीवन वे जनहित मे लगे रहे। एकबार अकाल पीडितो की मदद करते समय इतनी सुखी रोटियाँ मिली जिसे दांत से चबाने पर दांत से खून निकल जाता था ।उन सुखी रोटियो को पानी मे ऊबालकर खाना पडता था।फिर भी वे अपने सहयोगियों के साथ अकाल पीडितो की सेवा मे लगे रहे। उनके धर्म ज्ञान के सार का प्रतिफल ही है देश भर मे फैले हुए रामकृष्ण मिशन आश्रम।
गुरू की बडी महिमा होती है। रामकृष्ण परमहंस जी जैसे साधक सिद्ध गुरू सबको नसीब नही होते जिन्हे भैरवी तंत्र यानि अघोरतंत्र छोडकर सभी सिद्धियाँ हासिल थी ।
जब श्री कृष्ण के प्रेमाभक्ति मे लीन हुए तो प्रेमाग्नि मे ऐसा झुलसे की शरीर से रक्त तक निकलने लगा। हनुमान जी की साधना की तो पेड पर हनुमानजी की तरह ऊछलकुद मचाने लगे और बन्दरो जैसी रीढ की हड्डी भी बढ गई। जब वे साधना शुरू करते थे उनके कठोर हठयोग से उनकी पत्नी और आसपास के लोग कांप ऊठते थे।
साकार और निराकार दोनो की सिद्धियाँ उन्हें हासिल थी । उन्होंने इस्लामिक तरीके से इबादत करके भी सिद्धि हासिल की थी । उनको कोई सफेद दाढी वाले व्यक्ति से मुलाकात हुई थी । गुरू परंपरा महान है। अपनी कमाई शिष्य को दे डालते हैं । जिससे जहां तक गुरू पहुंचा रहता है वहाँ तक का राह दिखने लगता है और कठिन राह सुगम हो जाता है साथ ही सिद्धियो के साथ ज्ञान और प्रकाश का आभाष मिलने लगता है। आदि गुरू शंकराचार्य जी को भी गुरू गोविन्द पाद जी ने अपनी यौगिक सिद्धियाँ प्रदान की थी । अल्पायु थे शंकराचार्य जी ।अल्प आयु मे ही सनातनधर्म को प्रतिष्ठित करना था जो बौद्धदर्शन को धर्मरूप दे देने से शिथिल हो चुका था। बौद्ध दर्शन के आधार पर जीवन शैली अपनाई जा सकती है किन्तु वह सम्पूर्ण धर्म नहीं । यज्ञ के बिना जीव से ब्रह्मा पर्यन्त की तृप्ति नही हो सकती न ही सृष्टि की आयु बढ सकती है न ही प्रकृति का पोषण। जिससे जीवमात्र का कल्याण हो सके। इसलिए धर्म को स्थापित करने के लिए शिव के अंश आदिगुरू शंकराचार्य जी का प्रादुर्भाव हुआ कलियुग के सनातन धर्म प्रवर्तक के रूप मे। मूल बटवृक्ष रूपी सनातन के शाखाओ के रूप मे निकले पन्थो ने खुद को पृथक धर्म मान लिया था ।जिससे लोग भ्रमित हो रहे थे ।उन्होने उनके बीच सामंजस्य स्थापित किया और मूल सनातन की छत्र छाया मे पुष्पित पल्वित होने का अवसर प्रदान किया। उनके पास कठिन साधना का समय नही था कि कुण्डलिनी जाग्रत करके सप्तचक्रो का भेदन कर पाते । गुरू गोविन्दपाद की कृपा से एक सौ आठ चक्रो का भेदन कर महत मे पहुंच गये।
रामकृष्ण परमहंस जी भी शिवांश ही थे ।उन्होने सिद्धियो को तप से हासिल किया और धर्म सार “मानवता और जीवमात्र पर दया को ग्रहण किया ।”
विवेकानन्द जी जब शिकागो मे विश्व धर्म सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे तो उससमय उनमे रामकृष्ण परमहंस जी बोल रहे थे ।विवेकानंद जी जो बोल गये वह कोई सत्य द्रष्टा ही बोल सकता था ।उन्हे खुद पता नही था कि क्या बोल रहे हैं ।कहाँ से इतनी शक्ति और ज्ञान आ रहा है। इसी दिन के लिए परमहंस रामकृष्ण ने अपने शिष्य की खोज की थी । भारतीय धर्म जिसको टोना टोटका मात्र समझते थी पूरी दुनिया तथा सभ्य बनाने चली थी हमें । वह ज्ञान दर्शन पूरी दुनिया मे छा गया । खुद को महाज्ञानी और सभ्य समझने वाले सनातन धर्म दर्शन के आगे सारी दुनिया नतमस्तक हुई। विवेकानन्द ने विश्व मे भारत का सिर ऊँचा कर दिया । जिस ज्ञान रथ पर आरूढ होकर अर्जुन की तरह बाणो की जगह अमृत वाणी की वर्षा कर रहे थे उस रथ के सारथी तो गुरूदेव रामकृष्ण परमहंस जी थे ।उनकी आत्मा बोल रही थी ।विवेकानंद जी ने इसका संकेत दिया है। धन्य है ऐसे गुरू और उसके परफेक्ट शिष्य ।दोनो महान
दोनो को प्रणाम ।विवेकानन्द जी की जयन्ती पर हार्दिक शुभकामनायें ।हम भी उनके समान परोपकारी बन जायें और मानवता की सेवा करें ।यही धर्म है ।यही सनातन धर्म का सार है। अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम् द्वयम्।
“प
रोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।। “
प्रभाकर चौबे ।
