ब्राह्मणवाद एक शुद्ध सनातन धर्म : आलेखक : पंडित प्रभाकर चौबे
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ब्राह्मणवाद जातिवाद नही संस्कारित धर्मानुशासित व्यवस्था का नाम है।सनातन धर्म ब्राह्मणवाद पर आधारित है।पूरी सृष्टि ही ब्राह्मण विनिर्मित है इसलिए ब्राह्मणवादी सनातनी है। ब्राह्मणवाद बसुधैव कुटुम्बकम और परोपकार जीवमात्र पर दया पर आधारित है। सबका निर्वाह सुखपूर्वक प्रकृति प्रदत्त गुणधर्म के आधार पर हो सके इसलिए सब के लिए कर्तव्य निर्धारित किये गये है और तदनुरूप अधिकारो की भी व्याख्या की गई है। ब्राह्मण वाद मे धर्मानुशासन सामाजिक अनुशासन, संस्कारोन्नयन, उदारता , दानशीलता , सहिष्णुता, त्याग , तपस्या, श्रेष्ठ जनो का सम्मान, धर्मनिष्ठा, धर्माचरण, गुरू , पुरोहित और आश्रम व्यवस्था कायम है और कर्तव्य कर्म और स्वधर्म पालन को भक्ति की संज्ञा दी गई है।इस व्यवस्था मे कर्मसंकरता और बर्णसंकरता का निषेध है। कर्मसंकरता तो प्रारब्ध वश संभव हो भी सकता है कि बर्णसंकरता को स्वीकार नही किया जाता । अपवादस्वरूप ही ऐसा देखने को मिलेगा जिसको हेय दृष्टि से देखा जाता है और निकृष्ट माना जाता है। इस धर्म मे गौ, ब्राह्मण, यज्ञ कर्म , मूर्तिपूजा , कर्मकाण्ड, ज्योतिष , व्रत , त्योहार , उपवास , दान हवन , कीर्तन भजन आरती भगवद कथा प्रतिष्ठित है। ब्राह्मण के कार्यो मे किसी का हस्तक्षेप नही होता है न होना चाहिए ।वह धर्म की धुरी को धारण करता है और जगत हित को कर्तव्य मानकर धर्म मार्ग मे लोगो को लगाता है। वह राजसत्ता का नियंत्रक और धर्मसत्ता का स्वामी होता है। जगतहित मे कार्य करने हेतु ज्ञान प्रसार, भगवद कथा, पूजन , भजन और समाजिक अनुशासन कायम करता है। लोग उसके निर्देशो पर चलकर इहलोक और परलोक मे सुखी रहते हैं ।वह शिष्यो और यजमानों का उद्धारक होता है। सात्विक माहौल कायम करके समाज को भय और असुरक्षा से मुक्त करता है। अपराध, गलत कार्यो और पापकर्म के मार्ग पर लोगो को जाने से रोकता है इसतरह से कानून व्यवस्था और सिस्टम को सुचारू रूप से चलने मे सत्ता और राजा की मदद करके लोगो को सुखी और भयमुक्त करता है।वह आमजन के बीच उन्ही की तरह रहते हुए सभी कार्य करते हुए भी उनमे धार्मिक चेतना और धर्मभय को स्थापित करता है जिससे समाजिक राजकीय व्यवस्था चल सके और कानून व्यवस्था बनी रहे। प्रभु ने सबसे ज्यादा आवश्यक ऑक्सीजन को नाक के पास ही दिया वह भी मुफ्त मे। उसके बाद जल की व्यवस्था की फिर भोजन जिसके पचाने के लिए काम करने कंडिशन बनाया।फिर लोगो को अपनी ओर ले आने के लिए खुद ब्राह्मण, संत , साधु , भक्त बनकर बैठ गये।वैसे इस रहस्य ज्ञानवान तत्वदर्शी ही समझ सकते हैं ।ब्राह्मण भी कलि की माया से इस रहस्य और अपने जन्म लेने का उदेश्य समझ नही पा रहे हैं लेकिन धर्म और ईश्वर के प्रति सबसे अधिक समर्पित है और रहेंगे क्यूँ कि ब्राह्मण मे जन्म लेना आसान नही है ।पिछले जन्म के पुण्य कर्मो से धर्मातत्वाभाष ब्रह्मज्ञानाभाष के आने पर ही प्रकृति ब्राह्मण मे जन्म देती है।जिसप्रकार तप चुक राज राज चुक नरक होता है ।उसीप्रकार ब्राह्मण मे जन्म लेकर ब्राह्मणत्व से वंचित रह जाना अभिशाप है।
मनुस्मृति मे भी कहा गया है कि संस्करो से ब्राह्मण चाण्डाल और शुद्र ब्राह्मण हो सकता है ।इसका मतलब यह है कि जगत कर्मानुसार है। कर्मो से ही प्रारब्ध और संस्कार प्रवृत्ति प्रकृति स्वाभाविक चेष्टोओ की उत्पत्ति होती है ।इसको हम नाप नही सकते ।स्वयं इसके अनुसार प्रारब्ध भाग्य योनि का निर्थारण प्रकृति कर देती है ।चौरासी लाख योनियां कर्माहंकार के कारण प्रकट हुई है।जिसमे कर्मानुसार जन्म लेने की विवशता है।मानव जीवन दुर्लभ है। मोक्ष का राह इसी मे मिल सकता है। दरिद्रता एक प्रारब्ध है लेकिन जो इस दण्ड से बचने के लिए अनधिकार चेष्टा करते है वे अपने आवागमन के बन्धन को दृढ करते हैं ।धर्म की गति गहन है ।एक वेश्या को स्वर्ग और एक गृहिणी को नरक हो सकता है। ब्राह्मण का जन्म भी कुत्ते मे हो सकता है ।चाण्डाल का जन्म ब्राह्मण मे हो सकता है।यह प्रकृति ही निर्धारित करती है ।ब्राह्मण भी नही कर सकते अन्य की तो बात ही अलग है।पंडित प्रभाकर चौबे ।