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संपादकीय

एक कथा है ।जिसमे पंडित जी का नाम उल्लिखित नही है

 

 

एक कथा है ।जिसमे पंडित जी का नाम उल्लिखित नही है

 

 

 

एक पंडित जी किसी चोर के घर का खाना खा लिये तो उनके मन मे चोरी की भावना आ गई। वे किसी के घर मे चोरी करने जा घुसे। लेकिन जब देखा कि घर मे ठाकुर जी विराजमान हैं और गंगाजल तुलसी मिश्री जलपात्र मे रखा है तो आचमन कर लिये और अन्नमय दोष उतर गया ।वे लगे ठाकुर जी का पूजा करने और शंख फूंक दिये तब गृह स्वामी की निन्द टुट गई। पंडित जी को रात्रि मे घर मे घुसकर पूजा करते देखा और पूछा कि आप रात्रि मे मेरे घर मे किस प्रयोजन से आये थे?तब पंडितजी ने विस्तार से सारी बातें बताई की मै तो चोरी करने आया था ।इसके पहले कभी चोरी नही की ।आज एकाएक चोरी का भाव आ गया मुझसे गलती हो गई। लेकिन आपके घर पर ठाकुर जी का मन्दिर देखकर मुझे पूजा करने कि ईच्छा जग गई भगवान का चरणोदक पीया ।

सेठ बहुत धार्मिक स्वभाव का था ।उसने पंडित जी को बैठाकर पूछताछ शुरू की की महाराज आप इतने संस्कारी भक्त ब्राह्मण हैं फिर आपके मनमे चोरी की भावना कैसे जगी । ब्राह्मण देवता कुछ भी नही कह पा रहे थे । उनकी कोई मजबूरी भी नही थी ।घर परिवार था नहीं । दान दक्षिणा से काम चल ही जाता था। सेठ ने दिमाग लगाया ।बताया पंडित जी आप अपनी दिनचर्या बताईए ।कहाँ कहाँ गये क्या क्या किये।

पंडित जी ने कहा कि एक अनजान व्यक्ति मुझको खाने को दे गया था जिसको खाने से मेरे मन मे चोरी का भाव जग गया मै रात होने के इन्तजार मे था कि किसी घर मे जाकर चोरी करूँ ।

धर्मात्मा सेठ समझ गया कि पंडित जी को अन्नमय दोष हुआ है। सेठ ने पूछा आपने वह भोजन भगवान को अर्पित करके तुलसीदल डाला था ।पंडित जी ने कहा नहीं भूल गये थे इसलिए उस भोजन के बनाने वाले और जैसा धन था वह कुसंस्कार भोजन मे रह ही गया वह नष्ट नही हो पाया ।इसलिए अन्नमय दोष उत्पन्न हो गया ।

सेठ ने पंडित जी के दिव्य संस्कार देखकर उनको दण्डवत करके पाद्य अर्ध देकर विधिवत पूजा की और भोजन कराकर वस्त्रादि दक्षिणा देकर विदा किया।

उसे यह ज्ञात था कि ब्राह्मण चुराकर भी कुछ ले ले तो दान का फल मिलता है । उससे पाप कटता है। सारा जीवन और कमाई तो ईश्वर का है । उनका दिया है ।ब्राह्मण उनका प्रतिनिधि है । खुद तो लेने आयेंगे नहीं ।इसीरूप मे ग्रहण करेंगे।गाय ब्राह्मण देवता यज्ञकर्म किसी की भलाई मे गया धन ही धन है ।वह आगे के जन्मो के लिए जमा की गई सम्पत्ति है ।

 

(भोजन का भोग लगाकर तुलसीदल डालकर भोग लगाना चाहिए तब भोजन करना चाहिए ।गौ कुत्ते तथा पितरो के निमित्त भी तीन बार निकालकर ही भोजन करना चाहिए । तब अन्नमय दोष खत्म होता है लेकिन जहां ठाकुर जी को भोग लगाने लायक शुद्धता से बनाया गया भोजन नही बना हो वहाँ भोजन ग्रहण नही करना चाहिए ।या करना पडे तो एक माला जप जरूर करना चाहिए ।गायत्री मन्त्र या अपने गुरू के दिये मन्त्र या राम मन्त्र का।श्राद्ध मे भी भोजन करना पडे तो एक माला गायत्री जप अवश्य करना चाहिए ।दान लेने वाले ब्राह्मण के लिए तीन माला जप आवश्यक है अन्यथा दोष उत्पन्न हो सकता है ।तृष्णा युक्त मनुष्यों का धन खाने से तृष्णा उत्पन्न हो सकती है और दान दक्षिणा के कम मिलने पर असंतोष भी। जिससे अनादर और आलोचना के पात्र बन सकते हैं और बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है ।भगवान के भजन जप से जुडा उनको अर्पित ब्राह्मण पूरी पृथ्वी का दान लेकर भी दुषित नही होता । उसमे दरिद्रता नही आती।ब्राह्मण अगर दिये हुए दान मे से खुद भी दान नही करता तो तथा उपरोक्त विधि का आश्रय नही लेता तो उसका संस्कार प्रवाहहीन पोखर की तरह हो जाता है जो निरंतर जल निकासी नही होने के कारण दुषित हो जाता है। ब्राह्मण को गंगानदी के समान गंगोत्री यानि परमात्मा से जुडकर सबके उद्धार के लिए प्रवाहित होना चाहिए ।प्रभाकर चौबे चिंतन विचारक मंच ।

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