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संपादकीय

समाज में बदलाव आना यह सतत जरूरी है मानसिकता को बदलना समय की मांग

अस्पृश्यता निवारण ।

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आलेख : प्रभाकर चौबे ।

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समाज मे पहले लोग धोबी मेहतर छु जाने पर कुपित हो जाते

थे ।बच्चो को ज्ञान नही रहता है वे भेद नही करते ।इसलिए डांट पडती । पूछने पर कारण बताया जाता था कि चक्कर( मिर्गी ) बीमारी या बुखार हो सकता है। इसकी तह मे जाने पर लगा कि चूंकि ये बैक्टीरिया से लडते हैं ,सफाई का काम करते हैं ।इनकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है अन्य लोगो के बनिष्पत।जैसे हमलोग एक्वागार्ड का पानी पीकर भी बीमार पडते हैं लेकिन गाँवो मे लोग चापाकल तथा पहाडी ईलाको मे कुँऐ तथा तालाब का जल भी पीते हैं लेकिन बीमार नही पडते । शरीर को जैसे साधा जाय सध जाता है। कोरोना रोग से गंदी नाली मे लोटते सुअर , भैंस को कुछ नही हुआ ।उन्होंने साध लिया है शरीर को ।बैक्टीरिया को बैक्टीरिया क्या करेगा। विष से वे मरे जिसने विष को नही साधा ।भगवान शंकर तो विष पीकर ही अमर हो गये । औघढ श्मशान मे रहने वाले सडा कच्चा माँस और मानव मल खाने वाले को तो भयानक रोग होना चाहिए लेकिन नही होता कारण धीरे धीरे उसे साध लेते हैं ।जबकि बिहार के एक मुख्यसचिव को किस बात की कमी थी ? रिटायर भी नही थे ।सारी सुविधा थी ।फिर भी कोरोना हुआ और मर गये। जीव से छुआछुत का कारण घृणा नही होनी चाहिए ।सिर्फ अपनी पवित्रता की रक्षा ठीक उसीतरह करनी चाहिए जिसतरह लगी ऊठाने वाले यानि दाह संस्कार करने वाले को संन्यासी वेश बनाकर दूसरे से शरीर नही छुआना चाहिए जिससे एक प्रकार का ही आवेश शरीर मे प्रवाहित हो और मृतक की आत्मा को ज्यादा शान्ति मिल सके।

ब्राह्मण भी ब्राह्मण से छुआ-छूत मानते हैं । कितने सन्यासी अपने शरीर एक दो शिष्यो के अलावे किसी से छुने नही देते । शंकराचार्य जी का पैर छुने पर उन्हें शायंकालीन संध्या के पहले स्नान करना पडता है चाहे ठंढ कितनी भी हो। ऐसा जगद्गुरू शंकराचार्य श्री निश्छलानन्द जी के शिष्य ने मुझे बताया ।संत पशुपतिनाथ, त्रिदण्डी स्वामी जी भी कुछ शिष्यो तक ही को जो सेवा करते थे , शरीर छुने की ईजाजत दी थी ।

 

शरीर व्याभिचारी और कुकर्मी से भी नही छुआना चाहिए । उससे साधना मार्ग मे अवरोध पैदा होता है । ध्यान सही नही लग पाता । अन्नमय दोष भी इसका कारण बन सकता है। इसे दूर करने हेतु भजन का सहारा लेना पडता है तब ही ध्यान की पूर्ववत् स्थिति आ पाती है।

कितने साधु तो खुद का बनाया भोजन ही ग्रहण करते हैं । जो छात्र खुद बनाकर खाते हैं वे अन्य लडको से पढाई मे खुद को ज्यादा कन्सन्ट्रेट कर पाते हैं । क्यूँ कि बनाने वाले के संस्कार सोच मानसिकता का भी भोजन पर प्रभाव पडता है।

ब्राह्मण और शुद्र दोनो का काम तत्वतः एक ही है। एक समाज के अन्तरमन की सफाई करता है ।शुद्र बाहर की सफाई करता है। मनुस्मृति मे दोनो के लिए काफी कठोर नियम बनाये गये हैं ।शुद्र अज्ञानी लोगो के बहकावे मे मनुस्मृति का विरोध करते हैं ।जबकि ब्राह्मणो के लिए वह काफी कठोर तपस्वी संस्कारी जीवन की विधि को प्रतिपादित करता है। एक ही काम के लिए शुद्र से चौगुना अधिक दण्ड ब्राह्मण को निर्धारित करता है।फिर भी ज्ञान युक्त ब्राह्मण उसका विरोध नही करते । त्याग और तप का महत्व समझते हैं ।प्रभाकर चौबे।

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