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संपादकीय

सिमरिया घाट के कुंभ का मतलब क्या है कहीं भारतीय संस्कृत को समाप्त करने की तैयारी तो नहीं कुछ तथाकथित व्यवसाई संतो इशारे पर चल रहा खेल

[28/11, 6:29 am] डाक्टर मनोज कुमार शर्मा: जो कुंभ 2022 में होना चाहिए था ,वो एक साल पहले ही क्यों हो गया,कोई सनातन का ठेकेदार जबाब देगा क्या?या ऊंगलियों में लकवा आ गया।

[28/11, 7:26 am] Prabhakar Choubey: सिमरीया घाट पर कुम्भ हो रहा है। कुम्भ सिर्फ चार ही जगह होता है जहाँ अमृत की विन्दु छलके थे। लोकतंत्र है। मूर्ख बहुमत की दादागिरी चल रही है। ब्राह्मण निष्ठ सनातनदधर्म को रामदेव और मुरारी बापू निष्ठ बनाने की सुनियोजित साजिश की गई है।दोनो व्यवसाई हैं । धन के लोभ मे धर्म मे घुसे हैं । सनातन की पूरी समझ है न योग की । एक शमशान मे शादी कराता है और अल्ला अल्ला करता है। संत पशुपति नाथ जी से एक बार मिलने आने की सूचना दी। भगत लोग सोचे की ऊच्च आसन लगाया जाएगा। बडे धनी प्रख्यात कथावाचक हैं । ग्लेमर के आधार पर ही आजकल व्यक्तित्व का निर्धारण होता है।बाबा जी महाराज का अपना आसन बना हुआ था जिसपर गेरूआ कुशासन बिछाया जाता था । तब बाबा महाराज बिराजते थे । बाबा जी ने नीचे पुआल बिछाकर एक आसन लगवाया। भगत हैरत मे पड गये।पहुंचे हुए संत तो सबका स्थ्रेन्थ जानते हैं । मुरारी बापू भी सोचे थे की खुब आवभगत होगी ।संत से ऊँचा या बराबर का दर्जा मिलेगा। भारी मन से जमीन पर बैठे। बाबा ने पूजा जब कथा कहते हो तब ध्यान कहाँ रहता है। कथा का आनन्द खुद नही लोगे तो दूसरे को क्या मिलेगा। बात तो छोटी सी थी ।लेकिन संत के सामने तो पूरा भेद ही खुल गया था । भगतो को थोडे समझ मे आती । मुरारी बापू के आँखो से आँशु निकलने लगे। समझ मे आ गया ब्राह्मणवाद क्या है। नतमस्तक हो गये ब्राह्मणवाद यानि शुद्ध सनातन के धर्मानुशासन के सामने।

रामदेव महाराज लालू के गाल मे गोल्ड क्रीम मले ।साधु किसी की शारीरिक सेवा नही करता लेकिन शंकराचार्य बनकर धर्म पर कब्जा करने का लोभ था । त्रिदण्ड भी धारण नही किया है और सन्यास दीक्षा दे रहा है। व्यवसायी है।खुद को अपने व्यवसाय का ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने के लिए पेट नचाता है और डांड। खैर फिर भी दोनो आमजन से ऊपर के चीज हैं ।बस सनातन धर्म संस्कृति को समझ लें और धर्मानुशासन मे रहें ।

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