धर्म की जय हो ।अधर्म का नाश हो : प्रभाकर चौबे
_______________________
सनातनी आर्थिक व्यवस्था की ओर बढकर ही सुरक्षित और सुखी हुआ जा सकता है।हमारा उद्देश्य सिर्फ आरक्षण मिटाना नही होना चाहिए ।बल्कि धन का प्रवाह धर्म की तरफ हो जाय ऐसा अर्थतंत्र बनाने पर केन्द्रित होना चाहिए ।जिससे ज्ञानवान, सात्विक, सज्जन, उदार,धार्मिक, सुकुमार लोगो पर जीवनयापन का बोझ कम हो। श्रमविभाजन इस तरह से लागू हो कि किसी पर अनावश्यक बोझ न पडे। जो धन का सदुपयोग नही कर सकते वे कुपात्र हैं सदुपयोग धर्मशास्त्रानुसार धन का उपयोग ही है। । धन को अपना मानकर मानवता के विरूद्ध जाकर लोगो को कष्ट पहुँचाकर उसे बढाते जाने वालों का लक्ष्य मात्र अहंकार मे वृद्धि है वे कुपात्र हैं ।जो किसी की मदद नही कर सकते भले ही कितना भी कष्ट मे हो तो ऐसे मृतकसमान पशुओं के पास धन क्यूँ रहे? देश भर मे धन की मांग करते फिरे यह नही होना चाहिए ।आसपडोस हितमित्र ही उसके लिए पर्याप्त हैं ।लेकिन कायर कृपण लोगो की मानसिकता ऐसी है कि जो उनके पास है सब उनका है। ऐसे राक्षस पापकर्मी शोषण ,भ्रष्ट आचरण से किसी को सताकर दबाकर धन बनाते जा रहे हैं ।ऐसे धन के प्रवाह को जो प्रवाहहीन पोखरे मे गिर कर बेकार होने वाला है वह धन प्रवाहमान हो गंगा नदि की तरह। इसलिए ऐसे धनवालो पर कडे टैक्स लगाकर धन ले लेना चाहिए तथा अनुदार स्वार्थी राक्षसों की तरफ धन का प्रवाह भी रूकना चाहिए ।किसी के पास धन है तो वह सामाजिक व्यवस्था के कारण है । उसमे खामी है तो परिवर्तन आवश्यक है। किसको क्या मिलना चाहिए यह समाज का प्रबुद्ध त्यागी सनातनी धार्मिक समाजसेवक ही तय कर सकता है।ब्राह्मणवादी सनातनी व्यवस्था के अनुरूप चलें वे सुपात्र हैं ।धन का प्रवाह ऐसे दानशील परोपकारी लोगो के पक्ष मे होना चाहिए ।
महान कार्यो के लिए त्याग करने वालो के पास धन की कमी नही रहनी चाहिए जिससे वे सुरक्षित महसूस करें ।एवं उनकी उदारता दानशीलता और परोपकार से समाज का अन्य वर्ग भी खुद को सुरक्षित महसूस करे।
धन की ऐसी होड न हो जो सारे मानवीयता ,परस्पर के सौहार्द को ही निगल जाये और येन केन प्रकारेण सब के सब इसी उद्देश्य मे लग जायें ।पापयुक्त धन वालो को प्रतिष्ठा नही मिलनी चाहिए ।सादा जीवन उच्च विचारवाले प्रतिष्ठित हों। प्रभाकर चौबे ।30.जनवरी2023 .अपने जन्मदिन पर विशेष चिंतन पर आधारित आलेख।