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संपादकीय

सनातन धर्म संस्कृति पर प्रहार रोकने के लिए कठोर कानून की जरूरत

सनातन धर्म संस्कृति पर प्रहार रोकने के लिए कठोर कानून की जरूरत ।आलेखक: प्रभाकर चौबे

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सनातनधर्म की आलोचना करके ही कितने पन्थ बनाये गये जोकि अधुरे विश्लेषण और तत्त्व शोधन के परिणाम से अधुरे ही रहे। दर्शन के तौर पर ही उन्हे लिया जाना चाहिए था किन्तु मतिभ्रष्ट हिन्दुओ ने भी कई पन्थ बना डाले । उनमे बौद्ध जबकि यह दर्शन और आर्ट ऑफ लिविंग मात्र था को धर्म बना डाला और सनातन धर्म पर आक्रमणकारी हो गये। आनन्दमार्ग , रजनीशी विचार धारा एक दर्शन है धर्म नहीं ।अफवाहो और विज्ञापनों से कई धर्माभाष पर आधारित पन्थो ने भ्रम पैदाकर अपनी दुकाने सजा लीं। जिनमे शिर्डी साईं भगत भी एक है। कोई मनुष्य भगवान की जगह नही ले सकता न ही उसरूप मे पूजनीय है ।ईस्लाम तक ऐसा बोलता है जबकि हिन्दु मूर्खता की सीमा का अतिक्रमण कर चुके हैं ।अवतार सत्तायें जिनकी धर्मशास्त्र व्याख्या करता है वही पूजनीय हैं ।गुरू , ब्राह्मण,गौ, नदी , पर्वत , तीर्थ , संत , महात्मा आदि भी पूजनीय हैं ।

वाममार्गी , ईसाई, इस्लामिक , नास्तिक तथा कैरेक्टर लेश लोग सनातन धर्म संस्कृति पर आक्रमणकारी रहे हैं । कारण इन्हे अपना फैलाव चाहिए ।ये सबके सब अधुरे हैं और कुछ तो बिल्कुल गलत ही हैं ।

आये दिनो सनातन धर्म के साधको ,कथावाचको की आलोचना के साथ फंसाने की कोशिशे की जाती है।

यह सनातन धर्म पर प्रहार ही है। गंडा ताबिज, बांधना, टोना टोटका करना ऊतारना तथा कम पढे लिखे लोगो को झुठा चमत्कार दिखाकर धर्मान्तरण इनका मुख्य उद्देश्य रहा है।इसपर भीमवादी , वामी , काँग्रेसी और नास्तिक नही बोलेंगे।मीडिया भी नही बोलेगी ।सिर्फ सनातनधर्म ही सबके लिए प्रहार के लिए साफ्ट कार्नर है।

भारत के ऋषि-मुनियों मे सिद्धियो की भरमार थी । आज भी एक सच्चे साधक के पास वे सब चीजे हैं । जिसको लोगो ने प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है जिनमे देवराहा बाबा , खपडिया बाबा , त्रिदण्डी स्वामी , पशुपतिनाथ स्वामी , श्यामाचरण लाहिडी , रामकृष्ण परमहंस , आदि उदाहरण हैं ।

आज विधर्मियों ,सनातन धर्म द्रोहियो के निशाने पर श्री धीरेन्द्र शास्त्री जी हैं । दिनांक बाईस मार्च दो हजार तेईस को एक किसी बाबा को भीमटे तथा एक डाॅक्टर खिल्ली ऊडा रहे थे उन्ही का समूह था ।लाईव टेलीकास्ट था ।आत्मा कैसे निकालते हैं डाॅक्टर पूछ रहा था कोई भीमटा ही होगा ।भीमट समूह मे यह सब किया जा रहा था ।बाबा को कोई चाण्डाल जैसा लुक बता रहा था । हमने कडी आपत्ति दर्ज की तो फेसबुक ने सुझाव दिया की इस क्म्युनिटी के खिलाफ पोस्ट है डीलिट कीजिए या इग्नोर कीजिए ।हमने डीलिट ही कर दिया ।मूर्ख षडयंत्रकारियो को समझाने की भाषा तो कठोर कानून ही हो सकता है। जो किसी बाबा के पास जाता है । वह अपनी जिम्मेवारी पर गया होता है ।लाभ को स्वीकार कह रहा है तो किसी अन्य को मिर्ची क्यूं लग रही है?ईसाई भोले भाले आदिवासियों को धर्मान्तरित करने के लिए मछली को ईशु के नाम पर आटा की गोली खिलाकर बोलते है । ईशु और ईसाई धर्म महान है इसलिए मछली एक बार मे खा गई ।इसलिए ईसाई बनो।

धर्मशास्त्रों मे बीमार पडने पर औषध , तंत्र , मंत्र सबका प्रयोग का सुझाव है।

आस्था चिकित्सा मे भी रोग निदान की अपार संभावनाये हैं ।

शब्दो मे भी शक्ति होती है।प्रार्थना मे शक्ति होती है किसी बीमार को मानसिक रूप से मजबूत कर देने पर उसकी आधी बीमारी दूर हो जाती है और कष्ट सहने की शक्ति आ जाती है ।कष्ट भी कम हो जाता है।औषध प्रयोग का निषेध नही है। रोग रूपी जंग जीतने के लिए सभी प्रयोग उचित है।आम भाषा मे भी दवा दुआ की बात कही जाती है।

अपना ही उदाहरण देता हूँ । मेरे पिता जी को बडी आंत का अल्सर था ।

 खोआ जादे खाने से हो गया था ।हम महामृत्युंजय का जप तथा चण्डी पाठ से उनके प्राण को रोके हुए थे। लेकिन रोग मे अपेक्षित सुधार कम था । चिकित्सा भी हुई तब ठीक हुए। एकबार एक बारीश के दिन मे उनको न्यूमिनिया हो गया । उसदिन हम अकेले पड गये सबको फोन लगाया कोई नही आया ।मैने घी मे लहसुन गरम करके पिलवा दिया और खुद माला लेकर बैठ गये । शाम तक भजन कीर्तन जप चलता रहा और शाम को उनकी खांसी ठीक हो गई। इसमे घी लहसुन और प्रार्थना दोनो काम आई।आप कहेंगे कैसे तो दिमाग और दिल मे भजन मन्त्र से वह शक्ति आ गई की रोग खत्म हो गया। करपात्री स्वामी जी का गौ रक्षा आन्दोलन मे सिर फट गया था । चिकित्सकों ने बेहोश करके टांका लगाने की बात कही लेकिन उन्होने मना कर दिया । और पूरे होशोहवाश मे टांका लगा वे ध्यानस्थ हो गये जिससे कष्ट का अनुभव नही हुआ।

अगर आप जप भजन को पहले ही स्टोर कर के रखेंगे तो कम भजन मन्त्र प्रयोग से भी छोटे रोग नष्ट हो जायेंगे लेकिन औषध प्रयोग भी छोडना नही चाहिए ।अगर मन्त्र पहले ही से सिद्ध कर लिया जाय तो एक दो बार पढने पर भी असर हो जाता है । हम तो जप भजन करते रहते है तब छ: घंटे मे रिजल्ट आ गया । भगवान का नाम बेअसर नही होता है । उससे राह निकल आती है ।सही चिकित्सा मिल जाती है।कई चिकित्सक प्रयोग करते रहे मेरे पिता जी के ईलाज मे। धन व्यय होता रहा लेकिन जब हमने महामृत्युंजय जप सवालाख करने का संकल्प नर्सिग होम मे ही उनसे करवा दी और आरण्य देवी मन्दिर मे जपयज्ञ शुरू करवाया सही चिकित्सक मिल गये और सही दवा चलने लगी।

किसी का रोग हल्का रहे यानि बुखार मात्र तो छुने से भी ठीक हो सकता है सिर दर्द भी । दवा जो काम करती है वही काम मालिस भी करता है ।यह स्वतः प्रमाणित है उसीप्रकार अध्यात्मिक प्रयोग भी असर करता है ।इसमे ठगी वाली बात नही है। बडा रोग हो तो प्रयोग भी ज्यादा करना पडता है जैसे चिकित्सक हाई एन्टी बायोटिक चलाते हैं उसी प्रकार ।

इस विज्ञान को नही समझने वाले मूर्ख लोग साधको का अपमान करते हैं । ब्रह्मा जी ने एकबार मुझे स्वप्न मे ही बता दिया था है कि एक सूई के गिरने तक का विक्षोभ नष्ट नही होता । (सच्ची घटना है )काफी कष्ट मे उनदिनो थे और ईश्वरीय साधना मे लीन थे । 84_ 85 की घटना है ।सचिवालय काॅलनी पटना की। सृष्टि काफी त्रुटिहीन व्यवस्था है ।किये हुए कर्मो का फल आज नही दिखे लेकिन व्यर्थ नही जाता इसलिए अच्छे कर्मो फल नही मिलता दिखे तो घबराना नही चाहिए । भगवान और गुरूजनो का साथ नही छोडना चाहिए । मछेन्द्रनाथ जी भी एक स्त्री के मोह मे फंस गये थे लेकिन शिष्य गोरखनाथ ने उनको ऊबारा ।जाग मछेन्दर गोरख आया कहकर जगाया। शिष्य और गुरू दोनो का काम है एक दुसरे को गिरने न दे। एक अवगुण सभी गुणो पर भारी नही पड जाता । उसके अच्छे कार्यो को भी देखकर व्यवहार करना चाहिए ।प्रायश्चित से शुद्ध हुआ जा सकता है । प्रतिष्ठित व्यक्ति की प्रतिष्ठा गिर जानी और सोशलबायकाट एक बडी सजा है ।फिर उसे प्रायश्चित करनी चाहिए ।प्रतिष्ठापूर्ण ढंग से उसे यह करने का सुझाव और मौका दिया जाना चाहिए । शंकराचार्य तक की गिरफ्तारी हो जाती है ।जयेन्द्र सरस्वती तक को गिरफ्तार किया गया जबकि शंकराचार्य का पद संविधान और राजसत्ता को धर्म नियंत्रित करने के लिए ही आदि गुरू शंकराचार्य जी ने बनाया था। । प्रायश्चित साधक खुद करते रहते हैं। गुरूजनो का दोष दर्शन नही करना चाहिए । साधना के उच्च स्तर पर जाने पर विधि और प्रारब्ध का भी खेल चलता है ।इन्द्र भी खेल मे ऊतर आते हैं । किसपर प्रहार नही हुए? विश्वामित्र तथा शंकर पर भी ।आप और हम क्या हैं? वैसे कुछ पाखण्डी भी धन के उद्देश्य से पाखण्ड रचते है उनसे बचना चाहिए ।

प्रभाकर चौबे ।

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