सनातन धर्म व्यवस्था ही सनातन धर्म है। प्रभाकर चौबे
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सनातन क्या है ? जो सृष्टि मे शुरू से चला आ रहा है और जब तक सृष्टि है चलता रहेगा। वह ग्रहो की गति , सूर्य ,चन्द्र का प्रकाश , पृथ्वी का भ्रमण, हवा , अग्नि, पृथ्वी, आकाश , जल का कार्य तथा सम्पूर्ण ब्राह्माण्डीय जीवो की क्रियाशीलता है।
अब धर्म क्या है? जो सनातन है।
सभी जीवो की शक्ति गुण स्वभाव पृथक हैं । सबमे मनुष्य अव्वल है। अब मनुष्यो मे भी पूर्व जन्मकृत कर्माहंकार के कारण अनेक जाति प्रजाति बनी हुई है। सबमे पृथक प्रकार की शक्तियाँ गुण ,प्रकाश , रंग , स्वभाव , प्रवृति, प्रकृति है । सनातन धर्म संस्कृति परफेक्टनेश की शिक्षा देता है । वह जीवन को जानता है उसकी आयु को भी । इतने कम समय मे सीमित साधनो सीमित क्षमता मे जीवो का उद्धार हो सके। इसलिए एक यज्ञमय संरचना, बर्णाश्रमधर्मयुक्त वजूद मे आई ।जिसमे सभी यज्ञकर्म से जुड गये। यज्ञ मानवो के इहलौकिक ,पारलौकिक हित के निमित्त किया गया सम्पूर्ण कर्म ही है। कोई सेवक होतो परफेक्ट हो ।मालिक , राजा या शिक्षक या योद्धा हो तो वह भी परफेक्ट हो ।अपने स्वभावज कर्तव्य को धर्म मानकर करे ।इसमे जितनी ईमानदारी बरतेगा ।बन्धन उतनी जल्दी टुटेगा। कर्माहंकार ही बन्धन और मोक्ष मे बाधक और चौरासी लाख योनियो मे भटकने का कारण है। जो नश्वर पदार्थो के लिए स्वभावज कर्तव्य धर्म का त्याग करते हैं वे अपना बन्धन दृढ करते हैं और इहलोक मे भी जीवन का रस ठीक उसी प्रकार नही ले पाते , जैसे सब्जी मे ज्यादा मशाला झोंककर सब्जी का वास्तविक स्वाद नही लेकर मशाला का स्वाद ही लिया जाता है। चौरासी लाख योनियो मे भटकने से बचने का एकमात्र साधन सनातन धर्म संस्कृति ही सिखाता है। वह भी ब्राह्मणवादी धर्मानुशासित संस्कारित व्यवस्था । जो सनातन धर्म संस्कृति का मतलब घडी घंट डोलाना समझते है तो वे सनातनधर्म का एक अंश ही जानते है। सम्पूर्ण सनातन धर्म तो मानवीय व्यवहार ही है । जिसका संकेत धर्मशास्त्रों और लाखो वर्षो से आ रही ऋषि परंपरा मे मिलता है। हम कोई छुई मुई नही है कि आजु के बेटुआ ऊडा देगा। सम्पूर्ण सृष्टि ही ऊड जाएगी। पंडित प्रभाकर चौबे ।