जातिवाद फैलाने में छत्तीसगढ़ की सरकार, केंद्र से भी एक कदम आगे __
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के 58%आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया है, इसके विरोध में छत्तीसगढ़ के सभी आदिवासी विधायक लाबिंग कर के सरकार पर दबाव बनाया, सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल, मनु संघवी, आदि बड़े वकील सुप्रीम कोर्ट मे पैरवी किए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधान करार दिया, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने EWS आरक्षण को 10 % करने पर अपनी सहमति दी।
अब छत्तीसगढ़ की सरकार ने कबिनेट की बैठक में st को 32%,sc को 13%, ओबीसी को 27%और EWS को मात्र 4% आरक्षण देने का प्रस्ताव पास किया है, आखिर क्यों ?
जो भी स्थापित जन प्रतिनिधि हैं वे ही इस आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी लाभ ले रहे हैं, बाकी भोले _भाले आदिवासी परिवारों को अच्छी शिक्षा और संस्कारो से दूर रखने हेतु आरक्षण का लाली पॉप दिखाकर अपना वोट बैंक तैयार करने मे लगे हुए हैं,75 सालो बाद जहां आरक्षण समाप्ति की बात होनी चाहिए वहां आरक्षण बढ़ाने की कोशिश प्रदेश और देश के लिए दुर्भाग्य जनक स्थित नहीं तो और क्या है?
आखिर न्यायालय की मनसा जो “सभी नागरिकों को समान अधिकार” वाली संवैधानिक भावना के अनुरूप है, उससे छेड़ _छाड़ करने पर सत्ता पक्ष और विपक्ष क्यों आमादा है? क्या किसी भी सामाजिक, राजनीतिक संगठन को देश हित की चिंता नहीं है ?
आखिर ऐसी स्थिति मे राष्ट्रवादी, देशभक्त लोग या विभिन्न सामाजिक संगठन जैसे कायस्थ समाज, क्षत्रिय समाज, वैश्य समाज, अग्रवाल समाज, ब्राह्मण समाज, सवर्ण समाज के विधायक व सांसद, और विभिन्न आरक्षण विरोधी संगठन क्यों नहीं विरोध कर रहे है ?
दस वर्षो के लिए संविधान प्रदत्त आरक्षण को वोट बैंक की कुटिल नीति के चलते बार _बार बढ़ाया जा रहा है, सुप्रीम कोर्ट के 50% की सीमा को भी लाघने का प्रयास किया जाता है, आखिर जन सामान्य कब तक इस तरह की घिनौनी राजनीति को सहन करता रहेगा ? आखिर कब तक योग्यता को आरक्षण की बलिवेदी पर बलिदान होना पड़ेगा ?
एक तरफ तो जातिवाद समाप्त करने का सभी राजनीतिक दल संकल्प लेते हैं वहीं दूसरी तरफ वोट बैंक के लिए जातीय आधार पर सारी योजनाऐं बनाते हैं, एक तरफ तो देश की एकता अखंडता और सामाजिक समरसता की बात करते हैं वहीं दूसरी तरफ ऐसी ब्यवस्था बनाते हैं, जिससे समाज में गृह युद्ध की स्थिति बनती जा रही है।
मंडल आयोग ने जो obc की परिभाषा दी थी क्या उसके आधार पर वर्तमान में समीक्षा की जरूरत नहीं है?
मंत्री, अधिकारी, बड़े व्यापारी बनने के बाद भी सिर्फ जाति के आधार पर उन्हे दलित या पिछड़ा मान लेना कहा तक उचित है?
क्या किसी के पास इसका जवाब है ?
