भौतिकवादी युग की अपनी एक विशेषता या अवगुण होता है। यह शरीर से ऊपर मानसिकता को विकसित होने से रोकता है। इसलिए गुरूकूल व्यवस्था अत्यन्त आवश्यक है जिससे बचपन से जवानी के पचीस साल तक ब्रह्मचर्य और सुव्यवस्थित श्रमसाध्य जीवन जीने की आदत लग जाये ।उसके बाद मानसिक विकृति की संभावना नही रहती ।पचीस साल मे ही ज्ञान, ईश्वर प्राप्ति स्वाध्याय सत्संग कर लेनी चाहिए ।उसके बाद जमाना नही हिला नही पायेगा खुद हिल जाएगा। लंगटो के बीच भी मन वासना मे रमेगा नहीं । सबको लगेगा ये भी हमी लोग जैसा रस लेता है।ऋषि दुर्वासा भी रस लेते थे और विदेह राज जनक भी ।मालपुआ खाते थे ऋषि दुर्वासा और दूब का रस का आश्वादन करते थे। विदेहराज नर्तकियो से घिरकर नृत्य देखते थे किन्तु विदेह थे ।शरीर रस मे और मन विचारशून्यावस्था मे। श्री कृष्ण बाल ब्रह्मचारी थे ।सौलह हजार एक सौ आठ रानियो से दस पुत्र और दो पुत्रियां उत्पन्न किये थे। वासनात्मक चिंतन से मुक्त हैं तो ब्रह्मचारी हैं ।राम जी एक पत्नीव्रती थे ब्रह्मचारी हनुमानजी ने भी माना ।वासनात्मक चिंतन
से मुक्त थे इसलिए ब्रह्मचारी थे। वासना के अधीन संभोग करने वाले और एक ब्रह्मचारी वासनात्मक चिंतन रहित के संभोग मे अन्तर होता है। वासनात्मक चिंतक का संभोग संभोग है ।ब्रह्मचारी के लिए मुत्रविसर्जन जैसी एक क्रिया मात्र है ।जिसमे वह लिप्त नही होता। एक नदी मे डुबे कुशल तैराक और एक तैर कर किनारे आने मे सक्षम मे अन्तर होता है। इसलिए समाज के लिए जिसमे अकुशल तैराक बैठे हैं ,कठोर बंदिशे बनाई गई हैं ।जिससे समाज दूषित न हो। महर्षि पराशर जैसे तपस्वियो के लिए कोई बंदिशे नही है ।वे जगतहित के लिए मलाहिन से वेदव्यास दो घंटे मे पैदाकर के लेकर चल देते हैं ।शापित अप्सरा सत्यवती के शरीर के मछली का दुर्गन्ध को दिव्य सुगंध मे बदल देते हैं और वह अक्षत यौवना ही रह जाती है। है आज के विज्ञान मे ऐसी शक्ति? ब्राह्मण मे उससमय क्या तेज था कि किसी जाति से ब्राह्मण वह भी तेजस्वी महर्षि निकाल लेते थे। आज वह शक्ति कहाँ है कितनो मे है ? जो किसी शुद्रा को ब्राह्मणी बना दे और महर्षि पैदा कर दे जो सभी संस्कारो का धाम भगवान का अवतार सिद्ध हो।वेदो ,पुराणो का संकलन करे और राईटर गणेशजी यानि साक्षात ब्रह्म को नियुक्त करे। दूसरे की गलती देखने की प्रवृति समाज को खोखला और धर्मानुशासनरहित बना रहा है। विपक्ष मे भौंकने और सत्ता मे रहकर शासन करने मे अन्तर होता है। जो हरिश्चंद्र, कर्ण, युधिष्ठिर और विश्वामित्र हैं उनकी परीक्षा भी कडी होती है। सामान्यजन उनके कार्यव्यवहार की अपनी दूषित संकीर्ण सोच से व्याख्यायित नही कर सकते। जैसी दृष्टि है वैसी सृष्टि है। पिण्ड मे ही ब्रह्माण्ड स्थित है।वात्स्यायन ने कामसूत्र की रचना की जगतहित के लिए । प्रेम और सौन्दर्य शास्त्र की रचनाएँ हुईं । सारे अनुसंधानकर्ता उच्च मानसिकता के ऋषि थे । वासनात्मक चिंतन से मुक्त थे । गहन गुफा मे प्रवेश किये तो निकलने की शक्ति थी । सामान्य जन ऐसा करेंगे तो पाप के भागी बनेंगे। श्री कृष्ण रासलीला कर सकते थे ।पौष्ड्रक और साम्ब नहीं । साम्ब को ऐसा स्वांग करने पर श्री कृष्ण ने कुष्ठ होने का शाप दिया ।सूर्योपासना से वे ठीक हुए। जो ऋषि है वह शरीर को एक यंत्र मानता है । पूर्जा पूर्जा खोलकर देखलेगा निर्लिप्त भाव से ।कारण वह चिकित्सक है ।देखेगा नही तो रोग कैसे होता है रोग का कारण क्या है निदान क्या होगा ?कैसे बतायेगा।वह त्यागी है। ऑपरेशन सीखने मे कुछ जीवो का बलिदान भी होता है। लेकिन उससे हजारो की जान बचती है ।सबको मार्गदर्शन मिलता है। सबकी परिस्थितियों अलग अलग होती है। इसलिए धर्म भी सबका अलग अलग है। सनातन तत्व को जानने वाले हालातो मे सर्वश्रेष्ठ राह निकाल लेते हैं जिसमे पुण्य अधिक और पाप कम होता है। यही सोच और विवेकयुक्त निर्णय उनका धर्म होता है। जो कर्माहंकार से रहित हैं ऐसे लोग न पुण्य करते है न पाप ।भले ही करोडो लोगो को मार डालें ।श्रीकृष्ण और भगवान राम ने असुरो का वध किया लेकिन कर्माहंकार रहित होने के कारण पाप पुण्य मुक्त रहे ।कारण पूर्ण अवतार थे ।जबकि भगवान नृसिंह और परशुराम जी आवेशावतार थे ।इसलिए कर्माहंकार के कारण नृसिंह भगवान के कर्माहंकार का खण्डन भगवान शिव को शरभ पक्षी बनकर करना पडा और भगवान परशुराम जी को कर्माहंकार को नष्ट करने के लिए महेन्द्र गिरि पर तपस्या के लिए प्रयाण करना पडा। अगर पूर्ण ब्रह्म नही होते तो भगवान परशुराम सनातन धर्म संस्कृति कि रक्षा का भार रामजी को सौंपकर अपने दिव्यास्त्र और सिद्धियाँ उन्हे नही सौंपते ।एवं तप करने भी नही जाते ।आज भी महेन्द्र गिरि पर्वत पर वे तपस्यारत हैं ।प्रभाकर चौबे ।