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संपादकीय

मानवता और जीवमात्र पर दया परोपकार , दानशीलता से बढकर कोई धर्म नही है

मानवता और जीवमात्र पर दया परोपकार , दानशीलता से बढकर कोई धर्म नही है। घंटी डुलाकर साधना से सिद्ध हु रामकृष्ण परमहंस ने इसको समझा। ईसाई भी बीमार असहाय की सेवा मदद को धर्म मानते हैं । उसमे ईश्वर को देखते हैं ।यह मत भूलो की सब ईश्वर का है ।तुम्हारा कुछ भी नहीं ।बहुत प्रतिभासम्पन्न और बलशाली भीम परिस्थिति के चकोह मे फंस जाने पर असहाय हो जाते हैं ।तुम अंशु मिश्रा की मदद नही करोगे अपनी मदद करोगे ।अपनी पात्रता सिद्ध करोगे की इंसान हो। अगर इंसानियत और सहिष्णुता परोपकार और दानशीलता परस्पर का सहयोग कायम नही हुआ तो तुम्हारे मिथ्या अहंकार का नाश तय है। तुम थोडा नही दे सकते उसके लिए जिसने तुमको सबकुछ दिया है तो वह भी आँखें मुंद सकता है। कोई किसी को कुछ नही दे सकता । उसी का उसको समर्पित करके अपनी भक्ति और पात्रता सिद्ध कर सकता है। कोई धनी जन्म से है वह जन्म से गरीब भी हो सकता था और विकलांग भी।

इसलिए मोह छोडे । तुम क्या दोगे यह बताओ । वह दे रहा है और देगा ।यह देआदी मत करो।तुम्हारा कर्म तुम्हारे साथ जाएगा। परीक्षा अंशु मिश्रा की नहीं तुम्हारी हो रही है कि तुम इंसान हो या पशु या असुर हो चुके हो। कौर कैसे ऊठता है तुमलोगो का ? आश्चर्य है क्या अब इंसान कहे जाने वाले अधिकांश पशु हो चुके है और अन्धयुग की शुरूआत हो चुकी है? सृष्टि को बचाने के लिए मानवतावादी, सहिष्णु , परोपकारी, दानी , मददगार बनें। कोई किसी को नही देता अपना भविष्य बनाता है। ईश्वर सबकी परीक्षा ले रहा है।उसी तरह वह भी आँखे मुदेगा तो ठगो के जाल मे आकर निर्मल, रामरहिम और दरगाहो के पीछे भागोगे लेकिन जो देकर आये हो वही मिलेगा।कालाग्निरूद्र प्रभाकर चौबे चिंतन विचारक ।

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