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मां सरस्वती के इस मंत्र को करने से आती है विद्या अगर शंका हो तो कर सकते हैं प्रयोग प्रयोग के बाद आपको अद्भुत चमत्कार मिलेगा

 

मां सरस्वती के इस मंत्र को करने से आती है विद्या अगर शंका हो तो कर सकते हैं प्रयोग प्रयोग के बाद आपको अद्भुत चमत्कार मिलेगा

 

ऊँ सरस्वत्यै नम:।। ऊँ ऐं ऊँ।

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सरस्वती विद्याधिष्ठात्री हैं ।विद्या अविद्या दोनो की स्वामिनी।विद्या मात्र ब्रह्मविद्या ही है। जागतिक सारे भौतिकवादी जान माया से होने के कारण अविद्या है। शिवं सत्यं जगन्मित्थ्या ।शिवोहि परमं पदम्।

कला, संगीत, ज्ञान विज्ञान , वाणी , लेखनी, वाकपटुता , चतुराई, चिंतन, मन्थन, बुद्धि आदि सबकी शक्ति माता सरस्वती जी ही हैं । यह निराकार शक्तिरूप मे अखिल ब्रह्माण्ड मे व्याप्त हैं । सराचर जगत इनके कारण ही कार्यरत है ।और बोध शक्ति यही हैं । शैशवावस्था मे मुंह से माँ शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम इन्हीं की शक्ति की वजह से होता है।सभी जीवो को जो किसी पाठशाला मे नही गये ।भोजन करने जल ग्रहण करने ,खतरो से बचने का ज्ञान कैसे आ जाता है। तथा पक्षियो को एवं जीवो को जिसे बोलना सिखाया नही जाता उन्हें कलरव करना , मेंमियाना, दहाडना, जुगाली करना कैसे आ जाता है ।बच्चे पैदा करके उसका पालन करने का ज्ञान भी कहाँ से आ जाता है। यह सब उस निराकार शक्ति की माया है।क्या किसी ने माता सरस्वती को स्त्री रूप मे सिखाते देखा है ? किसी ने नहीं ।

ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं सरस्वती ।वह स्त्री रूपा क्यूँ हैं?ज्ञान की शक्तिऔरस्वरूपा होने के कारण स्त्री रूपा हैं । मनुष्य परम पुरूष नहीं ।परमपिता परमात्मा ही एक मात्र पुरूष है उसकी शक्तियाँ योग और प्रकृति की शक्तियाँ हैं जिसे नारी रूप दिया गया है।। प्रकृति शक्तिस्वरूपा है। कारण मूल प्रकृति से ही जगत की उत्पति हुई है ।सरस्वती भगवान की योगमाया शक्ति हैं ।शिव की प्रकृति तो समाधिस्थ रहने की होती है। अगर प्रकृति कार्यो के लिए प्रेरित या विवश न करे और शक्ति रूप मे पुरूष मे न विराजे तो मनुष्य रजाई से ऊठे भी क्यूँ? इतनी भी शक्ति बचेगी क्या ? यह तो कम ही कहा। उत्पत्ति ही कहाँ से होती ? प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण कोई भी पुरूष शतप्रतिशत पुरूष नही है । जो गर्भ से निकलेगा उसका शरीर पाँच महाभूतो से उत्पन्न होगा ।वह रजवीर्य , रक्त , मज्जा , मांस, हड्डी युक्त होगा और काम कला के प्रयोग से उत्पन्न होने तथा उत्पत्तिकर्ता माता पिता के आनुवांशिक गुणो से युक्त होने के कारण वह एक रूप ले लेता है । स्त्री पुरूष दोनो के संयोग से उत्पन्न होने के कारण साठ प्रतिशत पुरूष और चालिस प्रतिशत स्त्री का गुण रह जाता है।उसीप्रकार लडकियो मे भी वही प्रतिशत रहता है ।नही तो किसी भी परिस्थितियो मे पुरूष हारता नहीं न ही स्त्री पुरूषो से लडती झगडती और कभी कभी पुरूषो जैसा दबंगई दिखाती ।पुरूषो मे भी स्त्रियोचित भावना ममता प्यार दयालुता नही दिखता । उदाहरण से उतना नही समझा जा सकता आप अपने मन मे टटोलें कि क्या आप पूर्ण पुरूष हैं ?स्त्रियाँ भी मनन करके देखे की क्या वह एक सम्पूर्ण नारी है?पता चलेगा मिश्रित गुणधर्म से युक्त है।

फिर सरस्वती की मूर्ति पूजा क्यूँ जब वह निराकार शक्ति हैं? प्रश्न तो सही है किन्तु उत्तर आसान नही है ।इसके लिए तो ज्ञान विज्ञान की समस्त पुस्तकों का अध्ययन मनन के साथ प्रकृतितत्व का ज्ञान तथा दिव्यदृष्टि आ जाये ऐसी सिद्धि होनी चाहिए। गंगा , यमुना , सरस्वती सब नदियाँ हैं लेकिन नारी रूप मे पूजित हैं । इसके रहस्य मे जाने के लिए ब्राह्मणवाद को समझना होगा।जो ऋषि-मुनियों के दिव्य ज्ञान, दिव्य तत्व दर्शन पर आधारित ज्ञान है जिसपर सामाजिक , धार्मिक, राजनैतिक , आर्थिक व्यवस्था कायम की गई थी जिसपर चलकर भारत के सूर्यवंशी राजा सम्पूर्ण पृथ्वी के राजा थे और ब्राह्मण नारायण के समान थे।वैश्य व्यावसाय मे चतुर और ईमानदार तथा शुद्र सेवा भावना मे अतिउत्तम ।जिससे समाज सुखी था । क्या हम ऐसा सेवक पसन्द कर सकते है जो सोने के इन्तजार मे हो कि कब मालिक सोयें की कुछ चुरा लें ?

वैश्य ऐसा जो अधिक कीमत लेकर लोगो का जीना मुश्किल कर दे या क्षत्रिय ऐसा जो रणभूमि से भाग आये और अधर्म का साथ दे या ब्राह्मण ऐसा जो पक्षपात करे और पिता गुरू पुरोहित के पद पर रहकर भी भला न चाहे । ऐसी स्थिति किसे सुखी कर पायेगी ।सभी निराकार शक्तियों का साकार रूप भी होता है ।जो साधना से प्रकट किया जाता है जैसे निराकार व्याप्त अग्नि को अरणी मंथन से प्रकट किया जाता है । प्रमाण देखना होतो तो यज्ञ के समय होने वाले अरणीमंथन को देखें । काली जी को जो निराकार भगवान की योगमाया हैं ।रामकृष्ण परमहंस साकार करके अपने हाथो से मुंह मे भोजन कराते थे ।पंडित प्रभाकर चौबे ।

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