सप्त ऋषि मण्डल और अरुधंती
सप्तर्षि मण्डल तो सभी ने देखा ही होगा
सप्तर्षियों में एक वसिष्ठ हैं , वसिष्ठ के समीप ३.९९ कान्तिमान की अरुन्धती हैं । यदि आपकी आँखें ठीकठाक हैं तभी देख पायेंगे इन्हें , ३ से अधिक कान्तिमान के तारे प्रायः ओझल रहते हैं ।
अरुन्धती के अन्य नाम हैं जिह्वा तथा अक्षमाला । अरुणं धत्ते इति – जो अरुण को धारण करे वह अरुन्धती ।
इनको अक्षमाला कहे जाने का अभिप्राय है कि अक्षों को परस्पर जोडने वाला कोई सूत्र.
पृथ्वी का अक्ष उत्तर-दक्षिण ही है ।
जब तक अभिजित् और डेनेब ( १७००० वर्ष पूर्व)जैसे तारे ध्रुव रहे , तब तक ध्रुव दर्शन कोई समस्या नहीं थी ,
पारस्कर गृह्यसूत्र में ध्रुव को देखने का निर्देश है ।
किन्तु १२००० वर्ष पहले अभिजित् तारा पृथ्वी के अक्ष की सीध से हट चुका था , तब ध्रुव ध्यान की बात हुई ।
परन्तु उत्तर अक्ष के ज्ञान के लिये किसी तारे का सन्दर्भ और सीध आवश्यक ही है , कुछ काल पश्चात् इस समस्या का भी समाधान मिला तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.४.८ देखिये !
मघा वसिष्ठ अरुन्धती को मिलाकर सीधी रेखा अक्ष को बतलाती थी ।
लगभग ९००० वर्ष पूर्व में यह कार्य हुआ ।
इस प्रकार जिह्वा को नया नाम प्राप्त हुआ अक्षमाला ।
तभी से अरुन्धती दर्शन की परम्परा का आरम्भ हुआ ।
और यह सब महाभारत के पूर्व ही हुआ है ।
ऋग्वेदसंहिता के तृतीय मण्डल का ५७वाँ सूक्त भी विवाह संस्कार से सम्बन्धित है, अरुन्धती का उल्लेख है ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी
विवाह पंचमी: जिस देश में प्रेम और विवाह ही जीवन का आधार थे, वहां लिव-इन विमर्श का फलना: क्या स्वयं के हिन्दू अस्तित्व के प्रति आत्महीनता बोध इसका कारण है?
विवाह पंचमी, जिस दिन माता सीता एवं प्रभु श्री राम का विवाह संपन्न हुआ था, वह दिन लोगों की स्मृति से जैसे विलुप्त होता जा रहा है। विवाह पंचमी, जिसे हमारे बच्चों को विशेषकर पता होना चाहिए, वह हमारी युवा पीढ़ी के मस्तिष्क से धूमिल होती जा रही है। परन्तु ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा क्यों होता जा रहा है कि विवाह की मूल अवधारणा पर ही प्रहार होने लगे हैं? विवाह पंचमी इस वर्ष 28 नवंबर को मनाई गई।
दिनों दिन विवाह की मूल अवधारणा को चोटिल किया जा रहा है। स्त्री और पुरुष के सबसे पवित्र सम्बन्ध, जो सभी संस्कारों के मूल में है, उस पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। एक प्रकार की आत्महीनता से भरा जा रहा है। विवाह के स्थान पर लिव इन को प्रश्रय दिया जा रहा है। परन्तु सबसे बड़ा प्रश्न उठता है कि आखिर विवाह के स्थान पर लिव इन की प्रवृत्ति बढ़ क्यों रही है एवं विवाह की महत्ता को समझा क्यों नहीं जा रहा है?
लिव इन अर्थात बिना विवाह के रहना बहुत आम बात हो गयी है, और वह भी उस देश में जिसमें महादेव एवं पार्वती की ऐसी प्रेम कहानी है, जिसकी परिणति विवाह है। महादेव युगों तक पार्वती की प्रतीक्षा करते हैं। सती माता के पार्वती माता के रूप में आने की प्रतीक्षा एक व्यग्र प्रेमी की भांति करते हैं। परन्तु आज उसी देश में श्रद्धा अपने मातापिता से किसी “आफ़ताब” के साथ लिव इन में रहने के लिए चली जाती है। क्या श्रद्धा को किसी ने माता सीता, माता पार्वती के प्रेम की कहानी नहीं समझाई होगी?
संभवतया नहीं! यदि बताया भी गया होगा तो अकादमिक विमर्श ने उसे मिटा दिया गया होगा!
आज जब हम विवाह पंचमी की बात करते हैं तो पाते हैं कि भारत में साहित्य में जो विमर्श हुआ, उसने विवाह को पीछे धकेलने के लिए पहले विवाह के विमर्श के आधार स्तम्भ अर्थात प्रभु श्री राम एवं माता सीता के प्रेम पर प्रश्न चिह्न उठाए गए। माता सीता एवं प्रभु श्री राम के संबंधों को लेकर चुटकुले बनाए गए। जो अकादमिक विमर्श था, उसमें हमारे बच्चों के सामने ऐसा विमर्श प्रस्तुत किया गया जिसमें पवित्र प्रेम को ही समाप्त कर दिया गया। हाल ही में दृष्टि आईएएस के संचालक विकास दिव्यकीर्ति के कई वीडियो, जो उन्होंने माता सीता एवं प्रभु श्री राम के विरुद्ध अपमानजनक तरीके से बात रखी थी, उसके विषय में थे।
यहाँ तक कि कक्षा दस की पुस्तक में कन्यादान को लेकर अत्यंत अपमानजनक कविता पढ़ाई जा रही थी, हालांकि वह इस वर्ष के पाठ्यक्रम से हटा दी गयी थी!
अकादमिक एवं साहित्य में विवाह, प्रभु श्री राम, माता सीता का विमर्श ही पूरी तरह से विकृत कर दिया गया! प्रभु श्री राम एवं सीता माता के प्रेम और त्याग को लेकर सबसे बड़ा उदाहरण यही दिया जाता है कि वह अपने प्रेम, अपने विवाह के चलते प्रभु श्री राम के साथ वन चली गयी थीं। माता सीता द्वारा निभाए जाने वाले धर्म का कितना उपहास अकादमिक रूप से उड़ाया गया था। यह कहा गया कि माता सीता दरअसल इसलिए वन में गयी थीं क्योंकि उन्हें तीन तीन सासों की सेवा करनी होती ।
जो विकास दिव्यकीर्ति ने माता सीता की अग्निपरीक्षा के सम्बन्ध में बोला था, उसके पक्ष में आकर तमाम तरह की व्याख्याएं कर डाली थीं, और कई लोगों ने कहा था कि यह तो अकादमिक विषय हैं, इस पुस्तक से लिया, उस पुस्तक से लिया। परन्तु यह वाक्य कि माता सीता दरअसल अपने पत्नी होने का धर्म निभाने के लिए नहीं बल्कि तीन तीन सासों से बचने के चक्कर में वन गयी थीं।
कहने के लिए यह छोटा सा उपहास है, परन्तु यह कितना बड़ा प्रभाव हमारे जनमानस पर डाल रहा है कि आज जब हम विवाह पंचमी की बात करते हैं तो लोग माता सीता एवं प्रभु श्री राम के प्रेम को समझना ही नहीं चाहते हैं एवं वह उस पर सहज उंगली उठा सकते हैं। माता सीता के इतने बड़े त्याग को मात्र यहाँ तक सीमित कर दिया गया कि वह सासों के साथ नहीं रह सकती हैं।
जिन प्रभु श्री राम और सीता माता के प्रेम एवं विवाह के प्रतीक के रूप में विवाह पंचमी मनाई जाती है, वाम अकादमिक विमर्श ने उस प्रेम को ही समाप्त कर दिया, तो पर्व तो वैसे ही समाप्त हो गया।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जो ग्रन्थ पूरी तरह से धार्मिक होने चाहिए थे, जिन माता सीता एवं प्रभु श्री राम का विमर्श मात्र उन तक रहना चाहिए था जो उन्हें मानते हैं, उनका आदर करते हैं, वह विमर्श कैसे अकादमिक क्षेत्र में उन हाथों में चला गया, जो प्रभु श्री राम एवं माता सीता पर उपहास कर सकते हैं?
यह कैसी हठ हुई कि रामायण, महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों को कविता या विमर्श के रूप तक सीमित कर दिया गया? किसी भी अन्य सम्प्रदाय के धार्मिक ग्रंथों पर यह विमर्श नहीं होता कि क्या उसमे पितृसत्ता थी, कौन सी राम कथा आधुनिक है, या फिर उनमे स्त्री विमर्श कितना है! फिर हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों को अकादमिक विमर्श का भाग क्यों बना लिया गया? और यदि बनाया भी गया तो उसे धार्मिक अध्ययन तक सीमित रखना चाहिए था या फिर उसे उन दायरों में विमर्श में जाने देना चाहिए था, जो कथित आधुनिक या ईसाई मापदंडों के आधार पर हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों के काल आदि पर चर्चा करें?
विवाह पंचमी, जो ऐसा पर्व होना चाहिए था कि जिसमें महादेव-माता पार्वती, विष्णु जी-लक्ष्मी जी, प्रभु श्री राम एवं माता सीता, सत्यवान एवं सावित्री जैसे युगलों के दाम्पत्त्य प्रेम की कहानियों से परिपूर्ण होना चाहिए था, वह एक ऐसा गुमनाम दिन बनकर रह गया है कि जिसके विषय में चर्चा ही नहीं की जाती है।
बचपन से ही कथित पढ़ा लिखा समाज अपनी बेटियों के दिल में विवाह के प्रति यह कहकर अनादर भरने लगता है कि “पढ़ लिख लो, नहीं तो शादी करके रोटी पकाना!”
विवाह के प्रति उसके हृदय में एक विकृति भरी जाती है जैसे विवाह सबसे निकृष्ट संस्कार है, कैरियर बना लो, विवाह का क्या है? कभी भी हो जाएगा! परन्तु उसके कारण समाज में विकृति जो उत्पन्न हो रही है, उस पर चर्चा शून्य है। ऐसा नहीं है कि लड़कियों या लड़कों को शिक्षा आदि से वंचित रखा जाए, परन्तु जितना महत्व शिक्षा का हो, उतना ही महत्व विवाह का भी हो।
लड़कियों को यह कहकर विवाह के प्रति तिरस्कार का भाव न भरा जाए कि “पढ़ लिख लो नहीं तो केवल रोटी ही थोपती रहना” और लड़कों के दिल में यह कहकर विवाह के प्रति विष न भरा जाए कि यदि सरकारी नौकरी नहीं की तो बेकार लड़की से शादी होगी!
विवाह का विमर्श तैयार करना है, जो आने वाली पीढ़ी में मूल्य, संस्कार आदि को प्रवाहित करे, जो धर्म की रक्षा हेतु तत्पर हो न कि मात्र नौकरी आदि तक ही विवाह का विमर्श सिमट जाए!
तभी विवाह पंचमी को धूम धाम से मनाया जा सकेगा!
और सबसे महत्वपूर्ण है कि विवाह, हमारे आराध्यों एवं हमारे धर्म के स्तंभों पर “सेक्युलर विमर्श” बंद हो।
विवाह पंचमी और यशोदा देवी द्वारा लिखित विवाह विज्ञान पुस्तक की महत्ता
भारतीय विमर्श में इन दिनों विवाह की पूरी अवधारणा को विकृत कर दिया है एवं उसे स्त्री के शोषण का आधार बता दिया जाता है। विवाह संस्था के विषय में ऐसा कह दिया जाता कि जिसमे प्रवेश करके लड़की का जीवन बर्बाद है और इतना ही नहीं इसे लड़कों के लिए केवल अतिरिक्त जिम्मेदारी बता दिया जाता है।
दाम्पत्त्य जीवन में क्या सुख है, वह इन दिनों जैसे गायब है। ऐसे में जब हम विवाह पंचमी मना रहे हैं तो आवश्यक है कि वैद्य यशोदा देवी द्वारा लिखी गयी पुस्तक “विवाह विज्ञान” पढनी चाहिए। यह पुस्तक इसलिए आज के लिए आवश्यक है क्योंकि यह पुस्तक विवाह को आध्यात्म एवं धर्म के साथ जोडती है। जब वामपंथी फेमिनिज्म विवाह को गुलामी बताता है और वह कहता है कि परिवार दरअसल नष्ट हो जाने चाहिए, उस समय यशोदा देवी का विमर्श अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि यशोदा देवी विवाह को तोड़ने के मुख्य कारण 70% असंतुष्टि वाली पूरी धारणा को ध्वस्त करती हैं।
वह प्रेम, देह, यौन सम्बन्ध एवं आध्यात्म, सभी को परस्पर इस प्रकार गूँथ देती है कि पाठक विवाह का महत्व समझ सकते हैं। वैध यशोदा देवी का नाम आम परिदृश्य से विलुप्त है। वह विलुप्त क्यों है उसके विषय में विमर्श होना ही चाहिए। क्योंकि यदि यशोदा देवी का विमर्श चलता तो आज विवाहों के टूटने की स्थिति नहीं आती। वह विवाह के लिए ग्रहों की अनुकूलता पर भी बात करती हैं।
वह विवाह को मात्र दो देहों का मिलन ही नहीं बतातीं, वह यौन संतुष्टि को मात्र देह तक नहीं जोडती है, बल्कि वह उससे भी कहीं अधिक वृहद स्वरुप प्रस्तुत करती हैं।
इस पुस्तक के समर्पण को ही पढ़ना चाहिए, जिसमें वह लिखती हैं कि दम्पत्तय जीवन को सुखमय बनाने वाले और नारी जीवन के महत्व को समझने वाले तथा गृहस्थाश्रम को स्वर्ग-सुख का अनुभव करने की अभिलाषा रखने वाले, आरोग्यता और दीर्घ जीवन तथा उत्तम सन्तान के इच्छुक दम्पतियों के कर कमलों में यह तुच्छ भेंट सादर समर्पित है!”
जहां इस समय का फेमिनिज्म एवं सामाजिक विमर्श केवल जीवन में सेटल होना ही निर्धारित करता है, कि बस शादी हो जाए और एक बच्चा! वर्तमान चलन में गृहस्थाश्रम में सुख की पूरी अवधारणा ही बदल गयी है और जिसका परिणाम है कि लिव इन में लोग रहने के लिए चले जाते हैं क्योंकि वह विवाह के उत्तरदायित्व को उठाने से हिचकते हैं।
वह विवाह के आदर्श में माता सती एवं महादेव को बताती हैं। वह महादेव एवं माता सती के प्रेम की व्याख्या करते हुए लिखती हैं कि “जिस प्रकार सती अपने शिव से प्रेम करती थीं, उससे कहीं अधिक शिव जी का प्रेम सती पर था!”
“शिवजी रात दिन सती के मृत शरीर को लिए फिरते थे।” वह प्रेम की व्याकुलता को लिखती हैं। क्या ऐसा प्रेम बिना विवाह के हो सकता है? नहीं? ऐसा प्रेम उस विवाह के बिना नहीं हो सकता है जो हमारे यहाँ पर सृष्टि के आरम्भ से ही है। यह पुस्तक उस बेहूदा संतुष्टि के प्रश्नों के तमाम उत्तर देती है,
वह दाम्पत्त्य प्रेम की महत्ता बताते हुए लिखती हैं कि
“दाम्पत्त्य प्रेम संसार का वह दुर्लभ पदार्थ है, जिसकी चाहना साधारण पुरुषों से लगाकर देवता तक करते हैं। दाम्पत्तय प्रेम के मुख से अधिक सुख स्वर्ग में भी नहीं हैं!
वह विवाह के उपरान्त होने वाले उस सुख की महत्ता के विषय में बात करती हैं, जिसे आज प्रेम और सेक्स दो अलग अलग आयामों में भौतिक रूप से परिवर्तित कर दिया। वह संतुष्टि की उस परिभाषा से परे देह, स्वास्थ्य एवं आध्यात्म को परस्पर जोडती हैं।
वह इस बात पर भी बल देती हैं कि गृहस्थी में सुख के लिए आर्थिक सामंजस्य एवं संतोष आवश्यक है। वह लिखती हैं कि आमदनी कम, खर्च ज्यादा होने के कारण ऐश्वर्य एवं सुख भोग से भी स्त्रियों की अभिलाषा पूर्ण नहीं होती है, इसलिए सैकड़ा पीछे निन्न्यान्वे दंपत्ति ऐसे मिलेंगे जिनमें उन्मुक्त प्रेम नहीं होता है। इसी कारण गृहस्थी का सूझ जैसा चाहिए होता है, वैसा नहीं मिलता है, बल्कि दाम्पत्य जीवन दुखमय हो जाता है।
वह विवाह में अनुकूलता को लेकर भी मुखर हैं। वह लिखती हैं कि स्त्रियाँ भी कई प्रकार की होती हैं, उन स्त्रियों के योग्य पुरुष भी कई प्रकार के होते हैं। किस स्त्री का किस प्रकार का पुरुष होना चाहिए, वैसे ही पुरुष से विवाह होने पर दाम्पत्त्य जीवन का सच्चा आनंद मिलता है!
