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संपादकीय

भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था को साधारण शब्दों में इस प्रकार समझें.

भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था को साधारण शब्दों में इस प्रकार समझें

 

 किसी व्यक्ति ने कोई समारोह किया जिसमें 300 लोग आमंत्रित थे.

आमंत्रित जनो का एक ग्रुप जिसमें 10 सदस्य यही तय कर लेतें है

समारोह में बने व्यंजनों में से जो सबसे अच्छा व्यंजन है ( उदाहरण से समझो रसगुल्ला) सिर्फ उसी को खाना है . हो सकता है उनमें से किसी की

खुराक ज्यादा हो. फलतः रसगुल्ला की कमी हो जाएगी जबकि मेजबान ने सही मात्रा में बनाया था.

 

जब मेहमान लोगों में यहाँ बात फैलती है अन्य व्यंजनों से प्लेट भरने लग जाते है ( भले ही व्यर्थ चले जाए) वह इसलिए एक भय बना रहता है यह भी खत्म ना हो जाए ( संचय)

 

अंत में होता यह है सब व्यंजन समय से पहले खत्म हो जाते हैं. कुछ लोग भूखे भी रह जाते है ( असमान वितरण)

 

समारोह में आये हैं तो लिफाफा तो देना ही होगा यह तय है ( जीएसटी)

 

इसप्रकार पूरे समाज में यह बात फैल जाती है ( जनता)

 

मेजमान कस्बे का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति है इसलिए पूरा कस्बा की नजर मे गिर जाता है ( विश्व)

 

इसके जिम्मेदार कौन लोग है वह 10 व्यक्ति.

 

इसी प्रकार की देश की अर्थव्यवस्था है जिसको सिर्फ 5-10 मित्रों ने संसाधनों पर कब्जा किया हुआ है.

10 लाख करोड़ तो वो हजम कर ही चुके अन्यो को भी हजम करने का रास्ता खोल दिया है ( विभिन्न मुफ्त, कर्जमाफी, आदि)

 

एक अच्छी खासी तथाकथित अर्थव्यवस्था असमान वितरण की भेंट चढ़ गई फिर भी सफाई यह है देश की 5 वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था.

 

देश का विश्व के मानक में वह भूखमरी, पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यूज़, लोकतांत्रिक अधिकारों आदि के मामलों में भले ही बंगला देश , पाकिस्तान से नीचे हो पर – सेठजी 2 नंबरी है.

 

असमान वितरण

 

Gsa

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