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क्या डीजे एक सामाजिक कुप्रथा नहीं है इससे सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण हो रहा है और हार्ड अटैक के मरीज बढ़ते जा रहे हैं क्यों ना इस पर भी रोक लगे

*D J(डीजे) एक समाजिक कुप्रथा

D J यह एक छोटा शॉर्ट शब्द लेकिन आज का समय इसके बिना अधूरा सा होता जा रहा है परन्तु इसकी खूबियां अच्छे से कही जा सकती हैं कि किस तरह से यह डीजे आम जन जीवन मुख्यतः भारतीय संस्कृति को अपने सिकांजे में कसता चला जा रहा है फिर चाहे वह त्योहार हो या मांगलिक कार्य, समाजिक हो या व्यक्तिगत, सामुदायिक हो या धार्मिक सभी की खुशियां डीजे में समाहित हो रही हैं।खैर विषय बहुत बड़ा है आगे के कुछ बिंदुओं पर कुप्रथा डीजे के प्रभाव एवं दुष्प्रभाव पर एक नजर देखते है।

*भारतीय त्यौहारों पर कुप्रथा का प्रभाव-* त्यौहारों का देश कहा जाने वाला देश भारत इस तरह से अपनी संस्कृति को तीव्र गति से पीछे छोड़ते हुए पश्चिमी सभ्यता की ओर बहा चला जा रहा है जैसे की विपरीत हवा में उड़ता पंछी का टूटा हुए पंख। इसमें भारतीय युवा पीढ़ी का कुछ कम योगदान नहीं है (अर्थात बहुत अधिक है) ।इसी में बात करें हम इस कुप्रथा की तो जहां त्यौहारों में झांझ, मंजीरे, ढोलक एवं अन्य प्रकार के भारतीय गायन एवं वादन होते थे जिनका आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक दोनों ही महत्व बहुत ही लाभकारी एवं स्पष्ट है। उसकी जगह इस कुप्रथा ने इस तरह लेली है कि इसके चाहने वाले आज भारत की न्याय व्यवस्था और कानून व्यवस्था से भी मुकाबला करने में नहीं हिचकते हैं।

         यह कुप्रथा हमारे मांगलिक कार्यों में इस तरह से आघात कर रही है जैसे कोई कुशल कारीगर किसी प्रतिष्ठित सुसज्जित मूर्ति को हल्के से तराश कर (वस्त्र आभूषण आदि ऊपरी परत जिनसे परम्परा एवं सभ्यता की झलक स्पष्ट होती हो) किसी अलग दृश्य को प्रकट कर देता हो इसका पता हमें उस वक्त तक नहीं चल पाता जब तक इस कुप्रथा को लेकर दो गुट (गुटबंदी) बन जाते हैं और मांगलिक कार्यों में विघ्न, अशांति एवं अमंगल उत्पन्न कर देते हैं अंततः हम इस कुप्रथा द्वेशी ठहराने के बजाय अपनों से ही बैर कर लेते हैं और इसी बदले की भावना से पुनः इस कुप्रथा का आयोजन होता है और यही कड़ी बार बार दोहराई जाती है परन्तु इस कुप्रथा की चालाकी समझ में नहीं आती।

*समाजिक कार्यों में कुप्रथा का प्रभाव-* आज कल समाज में चल रहे विभिन्न आयोजनों को प्रदर्शित एवं प्रसारित करने के लिए बढ़ चढ़ कर इस कुप्रथा की भागी दारी हो रही है कहने का आशय यह है कि हमारी समाज प्राकृतिक आकर्षण एवं वातावरण निर्माण को छोड़कर इन कुप्रथाओं जैसे महा विनाशक यंत्रों का प्रयोग करके जिस प्रकार समाज की विनाशशील गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है इसका सुक्ष्म एवं बृहद, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, बड़े एवं बच्चे, महिला एवं पुरुष सभी पर प्रत्येक जगह परिणाम देखने को मिल रहा है। इस प्रकार के वातावरण से समाजिक ही नहीं व्यक्तिगत जीवन भी दूषित होरहा है क्योंकि व्यक्ति है समाज का निर्माता है।

*सामुदायिक एवं धार्मिक कार्यों में कुप्रथा का प्रभाव -* यह कुप्रथा प्रत्येक व्यक्ति विशेष, वर्ग, समुदाय एवं धर्म के ठेकेदारों पर इतनी हावी होचुकी है कि किसी भी धार्मिक या सामुदायिक स्थान पर बिना कुप्रथा के किसी का अपने कार्य के प्रति उत्साह ही नहीं बढ़ता सभी आत्म शून्य होकर कार्य करते हैं और यह आत्मशुन्यता जब कुप्रथा के संपर्क में आती है तो सभी अपनी मर्यादाओं को भूलकर संस्कृति से विमुख हो कर पता नहीं किस नई संस्कृति का निर्माण कर बैठते हैं?

क्या यही पश्चिमी सभ्यता है? खैर पता नहीं को भी हो परन्तु धर्म के नाम पर यज्ञ एवं अनुष्ठानों को छोड़कर ऐसी नव संस्कृतियों को जन्म देने वाले यंत्रों एवं संयंत्रों को तो मैं एक नाम अवश्य देना चाहूंगा *महाभय विस्तारक यंत्र* । ऐसी कुप्रथा एवं यंत्रों से प्रभु श्री राम नाम के द्वारा ही बचाव संभव है वरन इन नई संस्कृतियों के भ्रम ने समाज एवं धर्म कार्यों को इस तरह से जकड़ रखा है कि जैसे भोजन के बाद अजगर उसे पचाने के लिए किसी लंबी एवं गोलाकार वस्त्र जैसे पेड़ के तने में कसकर लिपट जाता है।

          अपनी भारतीय संस्कृति इतनी धनाढ्य सुगम एवं शुद्ध है कि जिससे मनुष्य ही नहीं बल्कि अन्य सभी प्रकार के प्राण धारी स्थूल शरीर प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं फिर इन कुप्रथाओं एवं नव संस्कृतियों की क्या आवश्यकता हां अगर शौक है तो मैं बस यही कहूंगा कि शौक बड़ी चीज है जो बड़े लोग ही पूरा कर सकते हैं।

*बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर*

*पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर*

हालांकि यह कथन मेरा नहीं है परंतु जिनका यह कथन है वह जरूर मेरे अपने हैं। *पं0हिमांशु जी

ज्योतिष सलाहकार (प्रेरक वक्ता/लेखक)

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