भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के संग कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं । कैलाश पर्वत पूरी दुनिया का केन्द्र है।वहाँ पर समय काफी गतिमान रहता है ।लोगो के नाखुन ,बाल काफी तेजी से बढने लगते है और बुढा लगने लगते हैं ।भगवान भोलेनाथ के दरवार मे सबका प्रवेश संभव नहीं । पर्वत पर चढने की कोशिश मे कुछ अज्ञात शक्तियां रोकने लगती है। कुछ ने चेतावनी भी सुनी है ऐसा पता लगा है। कलियुग मे एक तिम्बती लामा ही कैलाश पर चढने मे सफल हुए जैसा की ज्ञात हुआ है।
कुछ लोगो का कहना है कि कैलाश पर्वत एक पिरामिड की तरह है जिसके अन्दर पूरा शिवलोक बसा है। वहाँ शिव जी का निवास अवश्य है । रावण, परशुराम , भृगु ऋषि वहाँ जा चुके हैं ।विष्णु लोक से नारद मुनी का भी आगमन होता रहा है। नन्दी , भृंगी , वीरभद्र ( बाणासुर) शिव गणो के साथ वहां विराजते हैं ।
उसी क्षेत्र मे क्षीर समुन्द्र भी है।स्वर्ग के बारे मे भी कहा जाता है कि हिमालय मे एक जगह है जहाँ से चार बाँस ऊपर स्वर्ग स्थित है।उस जगह से रावण ने सिढी लगानी की कोशिश की थी ।दुरबीन से देखने पर वह सिढी नजर आती है। हिमालय मे एक ऐसी जगह है जहाँ सिद्ध ऋषि मुनी रहते है जिसका नाम श्वेत द्वीप बताया गया है ।शायद स्वर्ग वही हो।जहाँ न भूख है न प्यास एक दिव्य प्रकाश फैला है परम शान्ति पसरी है।
भगवान शंकर की उपासना पूजा मन्दिर मे करने का अत्यधिक फल है। मन्दिर जाने से बचने के लिए लोग शिवलिंग घरो मे रखने लगे हैं ।शिव लिंग , शालिग्राम घर मे रखकर पूजना सबके बस की बात नही है । अथिति का सत्कार ठीक से नही कर पाने से दोष लगता है।उसी प्रकार गायत्री मन्त्र भी सबके लिए नही है। कठिन मन्त्रो का जप प्रयोग पुस्तक पढकर नही करना चाहिए ।टाइपिंग मिस्टेक भी रहता है ।ऊल्टा पुल्टा करने से हानि भी ऊठानी पड सकती है।
नम:शिवाय का जप तथा भजन कीर्तन सबकोई कर सकता है।
अधिक पाने के चक्कर मे बिना सिद्ध गुरू से मन्त्र लिये प्रयोग नही करना चाहिए ।गुरू ब्रह्मा, बशिष्ठ या विश्वामित्र जैसा होना चाहिए । जिसने उस मन्त्र को सिद्ध कर लिया हो या परंपरागत गुरू शिष्य परंपरा मे दीक्षित हो ।
ब्राह्मण गुरू मन्त्र दीक्षा देने मे समर्थ हैं लेकिन प्रयोग आसनादि की जानकारी शिष्य को दिये बगैर मन्त्र न दें। गुरू स्वीकार करके दीक्षित हुए बिना मन्त्र किसी को नही देना चाहिए ।
गुरू सन्यासी ब्राह्मण और राजा के दरवार मे खाली हाथ नही जाना चाहिए । कुछ लेकर ही जाना चाहिए । जिससे ज्ञान लेना हो वैसे गुरु को फल अर्पित करके ही ज्ञान की याचना करनी चाहिए ।शिव लिंग परमज्योतिर्मय ब्रह्म लिंग है।लिंग ब्रह्म शक्ति का प्रतीक है जिसमे चराचर जगत समाया हुआ है।हम ॠषिमुनियो और ब्राह्मणो के अवदानो से कभी ऊॠण नही हो सकते। जिसने सरल मार्ग से ब्रह्म तक पहुंचने और निराकार को बान्धने तथा सिद्ध तक करने का सरलतम राह की खोज की और सत्पात्रो के माध्यम से प्रकाशित की।अपनी मनोकामना पूर्ण करने तथा चतुर्विध पुरस्कार प्राप्ति का मार्ग दिखाया । सकाम और निष्काम भक्ति सिखाई।ऊँ नम: शिवाय।।।आलेखक।_