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राष्ट्र साधना के पथिक तथा स्मृतियों की धूप-छाँव का विमोचन • संस्मरण जीवन को दिशा देते हैं : पद्मश्री बाबूलाल दाहिया

 

 

राष्ट्र साधना के पथिक तथा स्मृतियों की धूप-छाँव का विमोचन

• संस्मरण जीवन को दिशा देते हैं : पद्मश्री बाबूलाल दाहिया

• राष्ट्र साधना भारत माता की अर्चना है : गोपाल भाई

 

 

 

गिरवा (बांदा)। शैक्षिक संवाद मंच द्वारा 3 जनवरी को आयोजित शैक्षिक संगोष्ठी एवं शिक्षक सम्मान समारोह चित्रकूट में मंच द्वारा प्रकाशित एवं शिक्षक साहित्यकार प्रमोद दीक्षित मलय द्वारा संपादित दो पुस्तकों “राष्ट्र साधना के पथिक” तथा “स्मृतियों की धूप-छाँव” का लोकार्पण मंचस्थ अतिथियों द्वारा किया गया। विमोचन सत्र की अध्यक्षता गोपाल भाई ने की तथा मुख्य अतिथि पद्मश्री बाबूलाल दाहिया तथा सारस्वत अतिथि डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित विशिष्ट अतिथि डॉ. धांसू अन्नू सिंह धाखड़ एवं आलोक मिश्रा आदि ने दोनों संग्रहों की भूरि-भूरि सराहना कर रचनात्मकता की अभिव्यक्ति हेतु प्राथमिक शिक्षा में कार्यरत रचनाकारों का हौसला बढ़ाया।

       पुस्तक विमोचन के पहले अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर विधिवत शुरुआत की गई। कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए प्रमोद दीक्षित मलय ने बताया कि प्राथमिक शिक्षा में कार्यरत शिक्षक-शिक्षिकाओं की रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए शैक्षिक संवाद मंच समय-समय पर साहित्य की विभिन्न विधाओं पर साझे संग्रह प्रकाशित कर रहा है। उसी क्रम में संस्मरण विधा पर “स्मृतियों की धूप-छाँव” तथा जीवनी विधा पर “राष्ट्र साधना के पथिक” पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। रुद्रादित्य प्रकाशन प्रयागराज से प्रकाशित दोनों पुस्तकों का आवरण राज भगत ने तैयार किया है।‌ स्मृतियों की धूप-छाँव में उत्तर प्रदेश के 53 शिक्षकों के संस्मरण लेख शामिल हैं तो वहीं “राष्ट्र साधना के पथिक” में क्रांतिकारियों के जीवन एवं योगदान पर आधारित 48 शिक्षकों के लेखों को स्थान मिला है।

        विमोचन उपरांत मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने कहा कि संस्मरण जीवन को दिशा देते हैं। संस्मरण व्यक्ति को कुछ नया रचने-गुनने को प्रेरित करते हैं। संस्मरण लेखन के दौरान व्यक्ति अपने अतीत की यात्रा कर लेता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में गोपाल भाई ने कहा कि राष्ट्र साधना समाज रचना के लिए आवश्यक है। यह भारत माता की अर्चना वंदना का एक अंग है। क्रांतिकारियों की जीवनी समाज में प्रेरणा उत्पन्न करेगी। वहीं संस्मरण केंद्रित पुस्तक व्यक्ति को अपने जीवन में झांकने का रास्ता उपलब्ध कराएगी। उल्लेखनीय है की इन पुस्तकों की भूमिकाएं जितेंद्र शर्मा देहरादून एवं आलोक मिश्रा दिल्ली ने लिखी हैं। वही रामनगीना मौर्य लखनऊ और महेश चंद्र पुनेठा, उत्तराखंड ने शुभकामना टिप्पणी दी है। विमोचन के बाद सभी रचनाकारों को अंग वस्त्र, सम्मान पत्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया!

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